विश्व आदिवासी दिवस का संपूर्ण इतिहास (भाग–9) विश्व आदिवासी दिवस का वर्तमान स्वरूप (2008–वर्तमान): वैश्विक आयोजन, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, वार्षिक थीम और भविष्य की चुनौतियाँ
भारत की सभी प्रमुख जनजातियों का इतिहास, संस्कृति, भाषा, परंपरा, सरकारी योजनाएँ, संवैधानिक अधिकार और शिक्षा से जुड़ी संपूर्ण जानकारी हिंदी में पढ़ें।
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इस दुनिया में आदिवासी समाज का विशेष महत्व हैं जो प्रकृति के अनुकूल हैं
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माया सभ्यता मध्य अमेरिका के क्षेत्रों में विकसित हुई। यह अपने उन्नत गणित, खगोल विज्ञान, लेखन प्रणाली और विशाल स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है।
मध्य मेक्सिको में विकसित एज़्टेक साम्राज्य एक शक्तिशाली राजनीतिक व्यवस्था थी।
दक्षिण अमेरिका के एंडीज़ पर्वतीय क्षेत्र में विकसित इंका साम्राज्य विश्व की सबसे संगठित प्राचीन व्यवस्थाओं में से एक माना जाता है।
1492 से पहले उत्तर अमेरिका में सैकड़ों अलग-अलग समुदाय निवास करते थे।
इनकी अपनी भाषाएँ, शासन प्रणालियाँ और सांस्कृतिक परंपराएँ थीं।
इनमें से कई समुदायों ने लोकतांत्रिक निर्णय प्रणाली और सामूहिक शासन की विकसित परंपराएँ विकसित की थीं।
पुरातात्विक साक्ष्य संकेत देते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में मानव उपस्थिति लगभग 50,000 वर्ष या उससे भी अधिक पुरानी हो सकती है।
ऑस्ट्रेलिया के Aboriginal Peoples तथा Torres Strait Islander Peoples की सांस्कृतिक परंपराएँ विश्व की सबसे प्राचीन निरंतर जीवित संस्कृतियों में गिनी जाती हैं।
माओरी समुदाय प्रशांत महासागर के समुद्री यात्रियों के वंशज माने जाते हैं।
उन्होंने न्यूज़ीलैंड में विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संरचना विकसित की।
आर्कटिक क्षेत्रों में रहने वाले Inuit समुदायों ने अत्यंत कठिन जलवायु परिस्थितियों में जीवन की अनूठी तकनीकें विकसित कीं।
अफ्रीका में अनेक प्राचीन समुदायों की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएँ रही हैं।
इनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—
इन समुदायों ने स्थानीय पर्यावरण के अनुरूप विशिष्ट सामाजिक और आर्थिक प्रणालियाँ विकसित कीं।
एशिया में भी अनेक ऐसे समुदाय हैं जिनकी सांस्कृतिक पहचान अत्यंत प्राचीन है।
इनमें विभिन्न क्षेत्रों के पर्वतीय, वनवासी और पारंपरिक समाज शामिल हैं।
विभिन्न देशों में इनके लिए अलग-अलग कानूनी और प्रशासनिक शब्दावली प्रयुक्त होती है।
नहीं। यह एक सामान्य भ्रांति है। विश्व के आदिवासी समुदायों में अत्यधिक विविधता पाई जाती है। इनमें अंतर पाया जाता है—
कई मूल निवासी समाजों ने आधुनिक विज्ञान के विकास से बहुत पहले—
जैसी उन्नत प्रणालियाँ विकसित कर ली थीं।
आज जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में इन पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का पुनः अध्ययन किया जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार विश्व में हजारों भाषाएँ बोली जाती हैं, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासी समुदायों से जुड़ी हैं।
इनमें से अनेक भाषाएँ विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं।
भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं बल्कि इतिहास, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान का भंडार भी होती है।
कई मूल निवासी समाजों में निर्णय सामूहिक सहमति से लिए जाते थे।
कुछ स्थानों पर—
महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
यह दर्शाता है कि राजनीतिक संगठन की विविध प्रणालियाँ आधुनिक राष्ट्र-राज्यों से पहले भी अस्तित्व में थीं।
विश्व के अधिकांश मूल निवासी समुदाय प्रकृति को केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन का अभिन्न अंग मानते रहे हैं।
उनकी सांस्कृतिक परंपराओं में—
विशेष रूप से दिखाई देती है।
आज पुरातत्व, मानवविज्ञान, भाषाविज्ञान और आनुवंशिकी के अध्ययन यह संकेत देते हैं कि विश्व की प्राचीन मूल निवासी सभ्यताएँ अत्यंत जटिल और विकसित थीं।
पुराने समय में उन्हें केवल "आदिम" या "पिछड़ा" मानने वाली धारणाओं को आधुनिक शोधों ने व्यापक रूप से चुनौती दी है।
1492 से पहले विश्व के विभिन्न भागों में विकसित मूल निवासी समुदाय केवल छोटे समूह नहीं थे, बल्कि अनेक स्थानों पर वे संगठित समाज, विकसित कृषि प्रणालियाँ, समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएँ और प्रभावशाली राजनीतिक व्यवस्थाएँ रखते थे। विश्व आदिवासी दिवस की पृष्ठभूमि को समझने के लिए इन सभ्यताओं का अध्ययन आवश्यक है, क्योंकि आगे आने वाले औपनिवेशिक काल ने इन्हीं समुदायों के इतिहास और भविष्य को गहराई से प्रभावित किया।
हाँ। माया, एज़्टेक और इंका जैसी विकसित सभ्यताएँ पहले से अस्तित्व में थीं।
नहीं। अनेक समुदाय कृषि, व्यापार, शहरी नियोजन और प्रशासन में भी उन्नत थे।
हाँ। कई समुदायों में परिषद, मुखिया और सामूहिक निर्णय प्रणाली जैसी व्यवस्थाएँ विकसित थीं।
हाँ। पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, पारंपरिक चिकित्सा और जलवायु परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में इनका ज्ञान महत्वपूर्ण माना जाता है।
आज दुनिया भर में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस (International Day of the World's Indigenous Peoples) मनाया जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसकी शुरुआत किसी उत्सव के रूप में नहीं हुई थी। यह दिन वास्तव में दशकों तक चले वैश्विक संघर्ष, मानवाधिकार आंदोलनों और संयुक्त राष्ट्र के भीतर हुए लंबे विमर्श का परिणाम है।
विश्व आदिवासी दिवस की जड़ें उन आंदोलनों में हैं, जिनमें मूल निवासी समुदायों ने अपनी भूमि, संस्कृति, भाषा, आत्मनिर्णय (Self-Determination) और अस्तित्व की रक्षा के लिए आवाज़ उठाई।
विश्व आदिवासी दिवस की मूल विचारधारा तीन प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है:
कई मानवशास्त्रियों और सामाजिक विचारकों का मानना था कि आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के बनने से पहले भी अनेक समुदाय अपने पारंपरिक क्षेत्रों में रहते थे। इसलिए उन्हें केवल "अल्पसंख्यक" नहीं, बल्कि मूल निवासी (Indigenous Peoples) के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।
औपनिवेशिक शासन (Colonialism) और बाद में औद्योगिक विकास के कारण दुनिया के अनेक आदिवासी समुदायों की—
इस ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करना और सुधारना इस विचारधारा का महत्वपूर्ण आधार बना।
विश्व आदिवासी आंदोलन का एक प्रमुख सिद्धांत यह था कि आदिवासी समुदायों को अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था के बारे में स्वयं निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए।
विश्व आदिवासी अधिकार आंदोलन किसी एक देश से शुरू नहीं हुआ।
1960 और 1970 के दशक में दुनिया के कई हिस्सों में आदिवासी संगठनों ने अपने अधिकारों के लिए आंदोलन शुरू किए।
इनमें प्रमुख क्षेत्र थे—
इन आंदोलनों ने संयुक्त राष्ट्र का ध्यान आकर्षित किया।
1971 में संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार विश्वभर के आदिवासी समुदायों की स्थिति का अध्ययन कराने का निर्णय लिया।
इसके लिए इक्वाडोर के राजनयिक José Martínez Cobo को विशेष प्रतिवेदक (Special Rapporteur) नियुक्त किया गया।
1972 से 1986 के बीच तैयार की गई यह रिपोर्ट पहली ऐसी अंतरराष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट थी जिसमें—
जैसे विषयों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया गया।
आज भी संयुक्त राष्ट्र के कई दस्तावेज़ इसी अध्ययन को आधार मानते हैं।
1982 में संयुक्त राष्ट्र ने Working Group on Indigenous Populations (WGIP) की स्थापना की।
इसकी पहली बैठक 9 अगस्त 1982 को जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड) में आयोजित हुई।
यहीं से पहली बार विश्व स्तर पर आदिवासी समुदायों को एक साझा मंच मिला।
इसी कारण आगे चलकर 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में चुना गया।
WGIP का कार्य था—
विश्व आदिवासी दिवस और उससे जुड़े आंदोलन को कई कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
एशिया और अफ्रीका के कई देशों का तर्क था कि उनके यहाँ लगभग पूरी आबादी ही ऐतिहासिक रूप से मूल निवासी है, इसलिए किसी एक समूह को "Indigenous" कहना विवाद पैदा कर सकता है।
यही कारण है कि लंबे समय तक "Indigenous Peoples" की सार्वभौमिक कानूनी परिभाषा पर सहमति नहीं बन सकी।
कुछ सरकारों को आशंका थी कि यदि आदिवासी समुदायों को आत्मनिर्णय का अधिकार दिया गया तो इससे अलगाववादी आंदोलनों को बढ़ावा मिल सकता है।
इसलिए कई देशों ने प्रारंभ में इसका विरोध किया।
आदिवासी आंदोलनों की सबसे बड़ी मांग अपनी पारंपरिक भूमि पर अधिकार की थी।
लेकिन अनेक देशों में सरकारें और निजी कंपनियाँ खनन, बाँध और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण इन अधिकारों को स्वीकार करने में हिचकिचाती रहीं।
कुछ देशों का मानना था कि आदिवासी समुदायों को मुख्यधारा में पूरी तरह शामिल कर देना ही विकास है, जबकि आदिवासी संगठनों का कहना था कि उनकी अलग सांस्कृतिक पहचान भी सुरक्षित रहनी चाहिए।
विश्व स्तर पर कई संस्थाएँ और संगठन इस पहल के समर्थन में आए।
इन संगठनों ने आदिवासी समुदायों के अधिकारों के समर्थन में शोध, अभियान और वैश्विक जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कुछ सरकारों और नीति-निर्माताओं ने निम्नलिखित चिंताएँ व्यक्त कीं—
हालाँकि समय के साथ अधिकांश देशों ने आदिवासी अधिकारों की आवश्यकता को स्वीकार किया और अंतरराष्ट्रीय संवाद आगे बढ़ा।
संयुक्त राष्ट्र ने 1993 को International Year of the World's Indigenous People घोषित किया।
इस वर्ष का उद्देश्य था—
यही अभियान आगे चलकर विश्व आदिवासी दिवस की औपचारिक स्थापना का आधार बना।
23 दिसंबर 1994 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने निर्णय लिया कि प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को International Day of the World's Indigenous Peoples मनाया जाएगा।
यह तिथि 1982 में WGIP की पहली बैठक की स्मृति में चुनी गई।
आधिकारिक घोषणा के बाद 1995 में पहली बार संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय और जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व आदिवासी दिवस मनाया गया।
इसके साथ ही कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, नॉर्वे और लैटिन अमेरिकी देशों के आदिवासी संगठनों ने भी अपने-अपने स्तर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि शुरुआत में यह आयोजन मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र और उससे जुड़े मंचों तक सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे यह विश्वव्यापी जन-अभियान का रूप लेता गया।
आज विश्व आदिवासी दिवस—
विश्व आदिवासी दिवस किसी एक समारोह या औपचारिक तिथि का परिणाम नहीं, बल्कि 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उभरे वैश्विक आदिवासी अधिकार आंदोलन, संयुक्त राष्ट्र के दीर्घकालिक प्रयासों और मूल निवासी समुदायों के दशकों लंबे संघर्ष का प्रतीक है। इसकी विचारधारा समानता, सांस्कृतिक सम्मान, ऐतिहासिक न्याय और आत्मनिर्णय के सिद्धांतों पर आधारित है। यही कारण है कि आज 9 अगस्त केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि विश्वभर के आदिवासी समुदायों की पहचान, गरिमा और अधिकारों की वैश्विक मान्यता का प्रतीक माना जाता है।
भारत की आदिवासियों का सामान्य परिचय में हम नीचे लिखे गए टॉपिक पर विस्तार से जानकारी दे रहे हैं यदि आप भारत की आदिवासी या अनुसूचित जनजाति के बारे में जानना चाहते हैं तो adiwasi-education का ये पोस्ट आपके लिए बहुत उपयोगी हो सकता हैं |
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