आदिवासी अधिकार घोषणा | UNDRIP 2007 का पूरा इतिहास संयुक्त राष्ट्र आदिवासी अधिकार घोषणा कैसे बनी?

 विश्व आदिवासी दिवस का संपूर्ण इतिहास (भाग–8)UNDRIP (2007) की 25 वर्षों की यात्रा: मसौदे से संयुक्त राष्ट्र महासभा तक का पूरा इतिहास



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  • प्रस्तावना

    • यदि 9 अगस्त 1982 को Working Group on Indigenous Populations (WGIP) की स्थापना ने वैश्विक आदिवासी अधिकार आंदोलन को दिशा दी, तो 13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा United Nations Declaration on the Rights of Indigenous Peoples (UNDRIP) को अपनाया जाना उसकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जाता है।
    • यह घोषणा (Declaration) लगभग 25 वर्षों की लंबी चर्चा, मसौदा-निर्माण, कूटनीतिक वार्ताओं और आदिवासी प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी का परिणाम थी।


    UNDRIP क्या है?

    • UNDRIP (United Nations Declaration on the Rights of Indigenous Peoples) संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 13 सितंबर 2007 को अपनाई गई एक ऐतिहासिक घोषणा है, जिसका उद्देश्य विश्व के मूल निवासी (Indigenous Peoples) समुदायों के सामूहिक और व्यक्तिगत अधिकारों को मान्यता देना और उनका सम्मान बढ़ाना है।
    • यह एक Declaration (घोषणा) है, अर्थात यह स्वयं किसी अंतरराष्ट्रीय संधि (Treaty) की तरह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन इसका वैश्विक नैतिक, नीतिगत और व्याख्यात्मक महत्व अत्यंत व्यापक है।


    UNDRIP की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

    1982 में WGIP बनने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि दुनिया भर में आदिवासी समुदायों से जुड़े मुद्दों पर एक समान अंतरराष्ट्रीय मानक (International Standard) की आवश्यकता है।

    मुख्य कारण थे—

    • भूमि और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े प्रश्न,
    • सांस्कृतिक संरक्षण,
    • पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा,
    • आत्मनिर्णय (Self-determination),
    • शिक्षा और भाषा अधिकार,
    • विकास परियोजनाओं में भागीदारी।

    1982: WGIP और प्रारंभिक विचार

    • WGIP की बैठकों में अनेक आदिवासी प्रतिनिधियों और विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि केवल अध्ययन और चर्चा पर्याप्त नहीं है।
    • आवश्यकता थी एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज़ की जो स्पष्ट रूप से आदिवासी समुदायों के अधिकारों को परिभाषित करे।
    • यहीं से UNDRIP की अवधारणा विकसित होने लगी।


    1985: मसौदा तैयार करने का कार्य

    1985 के आसपास WGIP ने एक प्रारंभिक मसौदे (Draft Declaration) पर कार्य प्रारंभ किया।

    इस प्रक्रिया में—

    • आदिवासी संगठनों,
    • कानूनी विशेषज्ञों,
    • मानवाधिकार विशेषज्ञों,
    • और सदस्य देशों

    की भागीदारी रही।

    यह संयुक्त राष्ट्र के इतिहास की सबसे व्यापक परामर्श प्रक्रियाओं में से एक मानी जाती है।


    1993: मसौदे का प्रारंभिक रूप

    • 1993 तक WGIP ने Draft Declaration का एक महत्वपूर्ण प्रारूप तैयार कर लिया।
    • उसी वर्ष International Year of the World's Indigenous People ने इस प्रक्रिया को अतिरिक्त गति प्रदान की।


    1994: Sub-Commission द्वारा स्वीकृति

    • 1994 में संयुक्त राष्ट्र की Sub-Commission on Prevention of Discrimination and Protection of Minorities ने Draft Declaration को स्वीकार किया और इसे आगे विचार के लिए भेजा।
    • लेकिन यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई थी।


    1995–2006: लंबी वार्ताएँ

    लगभग एक दशक तक विभिन्न सदस्य देशों और आदिवासी प्रतिनिधियों के बीच व्यापक चर्चा चलती रही।

    सबसे अधिक बहस निम्न विषयों पर हुई—

    1. Self-Determination (आत्मनिर्णय)

    क्या आदिवासी समुदायों को आत्मनिर्णय का अधिकार दिया जाना चाहिए?

    कई देशों को चिंता थी कि इसकी व्याख्या राजनीतिक पृथक्करण (Secession) के रूप में न की जाए।

    2. भूमि अधिकार

    कई आदिवासी संगठनों ने पारंपरिक भूमि और संसाधनों पर ऐतिहासिक संबंधों को मान्यता देने की मांग की।

    कुछ देशों ने इस विषय पर विस्तृत कानूनी स्पष्टता की आवश्यकता बताई।

    3. प्राकृतिक संसाधन

    खनन, वन, जल और अन्य संसाधनों के उपयोग से संबंधित अधिकारों पर भी लंबी चर्चा हुई।

    4. सांस्कृतिक विरासत

    पारंपरिक ज्ञान, लोककला, भाषाओं और सांस्कृतिक संपदा के संरक्षण को लेकर व्यापक सहमति विकसित हुई।


    2006: मानवाधिकार परिषद (Human Rights Council)

    • 2006 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UN Human Rights Council) ने संशोधित मसौदे को स्वीकार किया और महासभा को भेजा।
    • यह UNDRIP के अंतिम चरण की शुरुआत थी।


    13 सितंबर 2007: ऐतिहासिक मतदान

    13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मतदान के बाद UNDRIP को अपनाया।

    मतदान का परिणाम

    • समर्थन में: 143 देश
    • विरोध में: 4 देश
    • मतदान से अनुपस्थित (Abstain): 11 देश

    किन देशों ने विरोध किया?

    उस समय चार देशों ने विरोध में मतदान किया—

    • ऑस्ट्रेलिया
    • कनाडा
    • न्यूज़ीलैंड
    • संयुक्त राज्य अमेरिका

    इन देशों की मुख्य चिंताएँ भूमि अधिकारों, आत्मनिर्णय और कानूनी प्रभावों से संबंधित थीं।

    बाद के वर्षों में इन सभी देशों ने विभिन्न स्तरों पर घोषणा के प्रति अपना समर्थन या सकारात्मक रुख व्यक्त किया और इसके सिद्धांतों के साथ काम करने की प्रतिबद्धता जताई।


    UNDRIP के प्रमुख सिद्धांत

    1. आत्मनिर्णय का अधिकार

    आदिवासी समुदायों को अपनी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रगति से जुड़े मामलों में भागीदारी और निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए।

    2. संस्कृति की रक्षा

    भाषा, परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण का महत्व स्वीकार किया गया है।

    3. शिक्षा का अधिकार

    समुदायों को अपनी संस्कृति और भाषा के अनुरूप शिक्षा विकसित करने का अवसर मिलना चाहिए।

    4. भूमि और संसाधनों का महत्व

    घोषणा में पारंपरिक रूप से उपयोग की जाने वाली भूमि और संसाधनों के साथ आदिवासी समुदायों के संबंधों को विशेष महत्व दिया गया है।

    5. विकास में भागीदारी

    आदिवासी समुदायों को उनसे संबंधित विकास परियोजनाओं और नीतिगत निर्णयों में प्रभावी भागीदारी का अवसर मिलना चाहिए।


    Free, Prior and Informed Consent (FPIC)

    • UNDRIP की सबसे चर्चित अवधारणाओं में से एक है—

    FPIC (Free, Prior and Informed Consent)

    इसका सामान्य आशय है कि आदिवासी समुदायों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण निर्णयों से पहले—

    • स्वतंत्र वातावरण में,
    • पूर्व सूचना के साथ,
    • पर्याप्त जानकारी देकर,

    उनकी सहमति प्राप्त करने की प्रक्रिया पर बल दिया जाए।

    FPIC की व्याख्या और कार्यान्वयन विभिन्न देशों के कानूनों और परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।


    क्या UNDRIP कानूनी रूप से बाध्यकारी है?

    • नहीं, UNDRIP एक Declaration है, इसलिए यह किसी संधि (Treaty) की तरह स्वतः बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं बन जाती।

    फिर भी इसका उपयोग—

    • न्यायिक व्याख्याओं,
    • नीतिगत सुधारों,
    • अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं,
    • और मानवाधिकार मानकों

    के संदर्भ में व्यापक रूप से किया जाता है।


    UNDRIP और विश्व आदिवासी दिवस का संबंध

    हर वर्ष 9 अगस्त को मनाया जाने वाला विश्व आदिवासी दिवस केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है।

    यह UNDRIP जैसे दस्तावेज़ों में निहित सिद्धांतों—

    • समानता,
    • गरिमा,
    • सांस्कृतिक संरक्षण,
    • भागीदारी,
    • और मानवाधिकार

    के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है।


    UNDRIP के बाद क्या बदला?

    2007 के बाद अनेक देशों ने—

    • आदिवासी नीतियों की समीक्षा की,
    • भाषा संरक्षण कार्यक्रम शुरू किए,
    • सांस्कृतिक अधिकारों पर नए कदम उठाए,
    • और विभिन्न स्तरों पर आदिवासी समुदायों के साथ संवाद को मजबूत किया।

    हालाँकि विभिन्न देशों में इन सिद्धांतों का कार्यान्वयन उनकी संवैधानिक और कानूनी व्यवस्थाओं के अनुसार अलग-अलग रहा है।


    निष्कर्ष

    • UNDRIP (2007) विश्व आदिवासी अधिकार आंदोलन के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। 1982 में WGIP की स्थापना से शुरू हुई प्रक्रिया लगभग 25 वर्षों तक चली और अंततः 13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे स्वीकार किया। यह घोषणा आत्मनिर्णय, सांस्कृतिक संरक्षण, शिक्षा, भागीदारी और पारंपरिक भूमि से जुड़े अधिकारों जैसे सिद्धांतों को वैश्विक स्तर पर सम्मान देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम मानी जाती है।


    अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नं 

    प्रश्न 1: UNDRIP क्या है?

    उत्तर :- यह United Nations Declaration on the Rights of Indigenous Peoples है, जिसे 13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपनाया।


    प्रश्न 2: क्या UNDRIP कानूनी रूप से बाध्यकारी है?

    उत्तर :-  नहीं, यह एक घोषणा (Declaration) है, संधि (Treaty) नहीं। फिर भी इसका अंतरराष्ट्रीय नीतियों और मानवाधिकार विमर्श में महत्वपूर्ण प्रभाव है।


    प्रश्न 3: UNDRIP को पारित होने में कितना समय लगा?

    उत्तर :- 1982 में WGIP की स्थापना से लेकर 2007 में महासभा द्वारा इसे अपनाए जाने तक लगभग 25 वर्षों की प्रक्रिया चली।


    प्रश्न 4: 2007 में कितने देशों ने इसका समर्थन किया?

    उत्तर :- संयुक्त राष्ट्र महासभा में 143 देशों ने समर्थन में मतदान किया, 4 देशों ने विरोध किया और 11 देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया।