विश्व आदिवासी दिवस का इतिहास (भाग–4): 1900 से 1982 तक वैश्विक आदिवासी अधिकार आंदोलन और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका

 विश्व आदिवासी दिवस का संपूर्ण इतिहास (भाग–4) 20वीं शताब्दी में वैश्विक आदिवासी अधिकार आंदोलन (1900–1982): ILO, मानवाधिकार आंदोलन और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका



  • विश्व आदिवासी दिवस का इतिहास
  • Indigenous Rights Movement
  • ILO Convention 107
  • UN Indigenous History
  • आदिवासी अधिकार आंदोलन
  • 1982 Geneva Working Group
  • प्रस्तावना

    • 1492 के बाद कई शताब्दियों तक विश्व के विभिन्न मूल निवासी समुदायों ने राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों का सामना किया। लेकिन 20वीं शताब्दी में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह विचार उभरने लगा कि इन समुदायों के अधिकारों की रक्षा केवल राष्ट्रीय सरकारों का नहीं, बल्कि वैश्विक समुदाय का भी दायित्व है। यही वह दौर था जब International Labour Organization (ILO), संयुक्त राष्ट्र (United Nations) और अनेक सामाजिक आंदोलनों ने मिलकर आधुनिक आदिवासी अधिकार विमर्श की नींव रखी।


    20वीं शताब्दी की शुरुआत: बदलती विश्व व्यवस्था

    1900 के दशक की शुरुआत तक दुनिया का बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक शासन के अधीन था।

    अफ्रीका, एशिया, अमेरिका और ओशिनिया के अनेक मूल निवासी समुदाय अपने पारंपरिक जीवन और नई प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे थे।

    उसी समय औद्योगिक क्रांति, आधुनिक शिक्षा और वैश्विक व्यापार ने नई सामाजिक चुनौतियाँ भी उत्पन्न कीं।


    प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) और उसका प्रभाव

    प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व राजनीति में बड़े बदलाव हुए।

    युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना स्थायी शांति संभव नहीं है।

    इसी पृष्ठभूमि में 1919 में एक नई संस्था की स्थापना हुई—International Labour Organization (ILO)


    1919: ILO की स्थापना

    ILO का मुख्य उद्देश्य श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा और कार्यस्थलों पर बेहतर परिस्थितियाँ सुनिश्चित करना था।

    हालाँकि शुरुआती वर्षों में इसका ध्यान सीधे आदिवासी समुदायों पर केंद्रित नहीं था, लेकिन बाद में यही संस्था आदिवासी और जनजातीय समुदायों के अधिकारों से संबंधित महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मानकों के निर्माण में अग्रणी बनी।


    1920 और 1930 का दशक: बदलती सोच

    इस अवधि में मानवविज्ञान (Anthropology) और समाजशास्त्र (Sociology) के अध्ययन ने यह दिखाना शुरू किया कि मूल निवासी समाज अत्यंत विकसित सांस्कृतिक परंपराओं और ज्ञान प्रणालियों के धनी हैं।

    धीरे-धीरे यह धारणा कमजोर पड़ने लगी कि आधुनिकता का अर्थ स्थानीय संस्कृतियों का लोप होना चाहिए।


    द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945)

    द्वितीय विश्व युद्ध ने पूरी दुनिया को गहराई से प्रभावित किया।

    युद्ध के बाद मानवाधिकार, समानता और गरिमा जैसे विषय वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गए।

    यही वह समय था जब भविष्य में आदिवासी अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का मार्ग प्रशस्त हुआ।


    1945: संयुक्त राष्ट्र की स्थापना

    24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की स्थापना हुई।

    इस संस्था का उद्देश्य था—

    • अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखना,
    • मानवाधिकारों को बढ़ावा देना,
    • और वैश्विक सहयोग को मजबूत करना।

    आने वाले दशकों में संयुक्त राष्ट्र आदिवासी अधिकारों के सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक मंचों में से एक बन गया।


    1948: मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR)

    10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने Universal Declaration of Human Rights (UDHR) को स्वीकार किया।

    इस घोषणा ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि सभी मनुष्य जन्म से स्वतंत्र और समान गरिमा तथा अधिकारों के अधिकारी हैं।

    हालाँकि इसमें आदिवासी समुदायों का अलग से उल्लेख नहीं था, लेकिन इसके सिद्धांत आगे चलकर आदिवासी अधिकारों के आधार बने।


    1950 का दशक: नई नीतियों की शुरुआत

    युद्ध के बाद कई देशों ने अपने दूरस्थ और जनजातीय क्षेत्रों के लिए नई प्रशासनिक और विकास नीतियाँ बनानी शुरू कीं।

    इसी दौरान ILO ने आदिवासी एवं जनजातीय समुदायों पर विशेष ध्यान देना प्रारंभ किया।


    1957: ILO Convention No. 107

    1957 में ILO ने Convention No. 107 अपनाया।

    यह आदिवासी और जनजातीय समुदायों से संबंधित पहला प्रमुख अंतरराष्ट्रीय कानूनी दस्तावेज़ था।

    मुख्य उद्देश्य

    • सामाजिक सुरक्षा
    • शिक्षा
    • रोजगार
    • स्वास्थ्य
    • भूमि से जुड़े मुद्दे

    लेकिन आलोचना क्यों हुई?

    कई विशेषज्ञों का मानना था कि इस सम्मेलन में "मुख्यधारा में समावेशन" (assimilation) की अवधारणा अधिक दिखाई देती थी, जबकि सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण पर अपेक्षाकृत कम बल था।

    इसी कारण बाद में इसे संशोधित करने की आवश्यकता महसूस हुई।


    1960 का दशक: नागरिक अधिकार आंदोलनों का प्रभाव

    1960 का दशक विश्वभर में सामाजिक आंदोलनों का दौर था।

    अमेरिका में Civil Rights Movement, महिलाओं के अधिकार आंदोलन और उपनिवेशवाद से स्वतंत्रता प्राप्त करने वाले देशों के उभार ने मानवाधिकारों की चर्चा को नई दिशा दी।

    इसी वातावरण में आदिवासी समुदायों ने भी अपने अधिकारों की आवाज़ बुलंद करनी शुरू की।


    Red Power Movement

    संयुक्त राज्य अमेरिका में कई मूल निवासी संगठनों ने सांस्कृतिक पहचान, शिक्षा, भूमि और आत्मनिर्णय के मुद्दों पर आंदोलन चलाए।

    इन्हें सामूहिक रूप से Red Power Movement के नाम से जाना गया।


    ऑस्ट्रेलिया का Aboriginal Rights Movement

    ऑस्ट्रेलिया में Aboriginal समुदायों ने भूमि अधिकार, समान नागरिक अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की माँग उठाई।

    1967 के जनमत संग्रह (Referendum) के बाद इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हुई।


    कनाडा में First Nations आंदोलन

    कनाडा में First Nations, Inuit और Métis समुदायों ने ऐतिहासिक संधियों, शिक्षा और भूमि अधिकारों के प्रश्नों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया।


    1968: International Work Group for Indigenous Affairs (IWGIA)

    1968 में IWGIA की स्थापना हुई।

    इस संस्था ने विश्वभर के आदिवासी समुदायों पर शोध, दस्तावेज़ीकरण और अंतरराष्ट्रीय जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


    1969: Survival International

    1969 में Survival International की स्थापना हुई।

    इस संगठन का उद्देश्य दुनिया भर के मूल निवासी समुदायों के मानवाधिकारों, भूमि और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए कार्य करना था।

    आज भी यह आदिवासी अधिकारों के क्षेत्र में एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठन माना जाता है।


    1971: संयुक्त राष्ट्र की ऐतिहासिक पहल

    1971 में संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार विश्व के आदिवासी समुदायों की स्थिति का व्यापक अध्ययन कराने का निर्णय लिया।

    इस कार्य की जिम्मेदारी José Ricardo Martínez Cobo को सौंपी गई।

    यही अध्ययन आगे चलकर वैश्विक आदिवासी नीति का आधार बना।


    Martínez Cobo Study (1972–1986)

    यह अध्ययन लगभग 14 वर्षों तक चला।

    इसमें दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के मूल निवासी समुदायों की स्थिति, इतिहास, भूमि, संस्कृति और अधिकारों का व्यापक विश्लेषण किया गया।

    प्रमुख निष्कर्ष

    • ऐतिहासिक निरंतरता महत्वपूर्ण है।
    • आत्म-पहचान (Self-identification) का सम्मान होना चाहिए।
    • सांस्कृतिक संरक्षण आवश्यक है।
    • पारंपरिक भूमि और संसाधनों का महत्व स्वीकार किया जाना चाहिए।

    1977: जिनेवा सम्मेलन

    • 1977 में जिनेवा में गैर-सरकारी संगठनों के सहयोग से आदिवासी मुद्दों पर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। यह पहली बार था जब विभिन्न देशों के आदिवासी प्रतिनिधियों ने वैश्विक मंच पर अपने अनुभव साझा किए। इस सम्मेलन ने संयुक्त राष्ट्र का ध्यान और अधिक आकर्षित किया।


    1981: Working Group की तैयारी

    • 1970 के दशक के अंत तक यह स्पष्ट हो गया कि संयुक्त राष्ट्र को आदिवासी समुदायों के लिए एक विशेष तंत्र (Mechanism) स्थापित करना चाहिए। इसी उद्देश्य से 1981 में तैयारियाँ तेज़ हुईं।


    9 अगस्त 1982: इतिहास का निर्णायक दिन

    9 अगस्त 1982 को जिनेवा में Working Group on Indigenous Populations (WGIP) की पहली बैठक आयोजित हुई।

    यही वह घटना है जिसे बाद में विश्व आदिवासी दिवस की ऐतिहासिक आधारशिला माना गया।

    इस बैठक में—

    • आदिवासी प्रतिनिधि,
    • विशेषज्ञ,
    • सरकारी प्रतिनिधि,
    • और मानवाधिकार कार्यकर्ता

    एक साथ आए और पहली बार संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर आदिवासी मुद्दों पर औपचारिक चर्चा हुई।


    9 अगस्त की तिथि क्यों चुनी गई?

    • बाद में जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने विश्व आदिवासी दिवस घोषित किया, तो इसी पहली ऐतिहासिक बैठक की स्मृति में 9 अगस्त को प्रतिवर्ष International Day of the World's Indigenous Peoples के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया।


    निष्कर्ष

    • 1900 से 1982 तक का काल वैश्विक आदिवासी अधिकार आंदोलन के विकास का निर्णायक चरण था। ILO की स्थापना, मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, नागरिक अधिकार आंदोलनों का प्रभाव, José Martínez Cobo का अध्ययन और अंततः 9 अगस्त 1982 की जिनेवा बैठक—इन सभी घटनाओं ने मिलकर वह आधार तैयार किया जिस पर आगे चलकर विश्व आदिवासी दिवस की स्थापना हुई।


    अक्सर पूछने वाले प्रश्न 

    प्रश्न 1: ILO Convention 107 क्या था?

    यह 1957 में अपनाया गया आदिवासी और जनजातीय समुदायों से संबंधित पहला प्रमुख अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन था।

    प्रश्न 2: José Martínez Cobo कौन थे?

    वे संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक थे जिन्होंने आदिवासी समुदायों पर एक ऐतिहासिक वैश्विक अध्ययन तैयार किया।

    प्रश्न 3: 9 अगस्त 1982 क्यों महत्वपूर्ण है?

    क्योंकि इसी दिन जिनेवा में Working Group on Indigenous Populations (WGIP) की पहली बैठक हुई थी।

    प्रश्न 4: विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त को ही क्यों मनाया जाता है?

    9 अगस्त 1982 की उसी ऐतिहासिक WGIP बैठक की स्मृति में संयुक्त राष्ट्र ने 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में चुना।