9 अगस्त 1982 का इतिहास: Working Group on Indigenous Populations (WGIP) की स्थापना और विश्व आदिवासी दिवस की शुरुआत

 विश्व आदिवासी दिवस का संपूर्ण इतिहास (भाग–6) 9 अगस्त 1982 की ऐतिहासिक जिनेवा बैठक: Working Group on Indigenous Populations (WGIP) की स्थापना और विश्व आदिवासी दिवस की वास्तविक नींव



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  • प्रस्तावना

    • आज दुनिया भर में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाया जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस तिथि का चयन किसी संयोग से नहीं हुआ था।
    • 9 अगस्त 1982 को स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा (Geneva) में संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में पहली बार Working Group on Indigenous Populations (WGIP) की बैठक आयोजित हुई। यह पहली ऐसी आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय बैठक थी जिसमें आदिवासी समुदायों के अधिकारों पर केंद्रित संवाद के लिए एक समर्पित मंच बनाया गया।
    • यही कारण है कि बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मान्यता दी।


    1982 से पहले की पृष्ठभूमि

    1970 के दशक तक अनेक देशों से यह मांग उठ रही थी कि आदिवासी समुदायों के लिए संयुक्त राष्ट्र के भीतर एक स्थायी चर्चा मंच होना चाहिए।

    इसके पीछे मुख्य कारण थे—

    • भूमि अधिकारों से जुड़े प्रश्न,
    • सांस्कृतिक संरक्षण,
    • भाषाई विविधता,
    • सामाजिक भेदभाव,
    • और राजनीतिक भागीदारी की आवश्यकता।

    Martínez Cobo Study ने इन मुद्दों को वैश्विक स्तर पर व्यवस्थित रूप से सामने रखा और आगे की संस्थागत पहल का आधार तैयार किया।


    WGIP की स्थापना क्यों आवश्यक मानी गई?

    संयुक्त राष्ट्र की Sub-Commission on Prevention of Discrimination and Protection of Minorities ने महसूस किया कि आदिवासी समुदायों की समस्याएँ सामान्य अल्पसंख्यक मुद्दों से भिन्न हैं।

    इन समुदायों की अपनी—

    • ऐतिहासिक पहचान,
    • सांस्कृतिक परंपराएँ,
    • भूमि से संबंध,
    • पारंपरिक संस्थाएँ,
    • और विशिष्ट चुनौतियाँ

    हैं। इसलिए उनके लिए अलग कार्यसमूह (Working Group) की आवश्यकता महसूस की गई।


    Working Group on Indigenous Populations (WGIP) क्या था?

    WGIP संयुक्त राष्ट्र के अधीन एक विशेष कार्यसमूह था, जिसकी स्थापना 1982 में की गई।

    इसका उद्देश्य था—

    1. विश्वभर के आदिवासी समुदायों की स्थिति की समीक्षा करना।
    2. उनके मानवाधिकारों और मूल स्वतंत्रताओं की रक्षा से संबंधित अंतरराष्ट्रीय मानकों के विकास में योगदान देना।

    यह अपने समय का पहला ऐसा वैश्विक मंच था जहाँ आदिवासी प्रतिनिधियों को अपेक्षाकृत खुलकर अपनी बात रखने का अवसर मिला।


    पहली बैठक: 9 अगस्त 1982

    1. स्थान

    • जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड

    2. आयोजन

    • संयुक्त राष्ट्र की Sub-Commission के अंतर्गत

    महत्व

    यह पहली औपचारिक बैठक थी जिसमें आदिवासी मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केंद्रित चर्चा हुई।

    इस बैठक में सरकारी प्रतिनिधियों के साथ-साथ विशेषज्ञों और विभिन्न क्षेत्रों के आदिवासी प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया।


    पहली बैठक के प्रमुख उद्देश्य

    1. आदिवासी समुदायों की वास्तविक स्थिति को समझना

    विभिन्न देशों से प्राप्त अनुभवों और रिपोर्टों के आधार पर यह जानना कि समुदाय किन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

    2. मानवाधिकार मानकों का विकास

    ऐसे सिद्धांतों और मानकों पर विचार करना जो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय नीति निर्माण का आधार बन सकें।

    3. संवाद का वैश्विक मंच तैयार करना

    पहली बार विभिन्न देशों के आदिवासी प्रतिनिधि और सरकारें एक ही मंच पर विचार-विमर्श कर रहे थे।


    WGIP की कार्यप्रणाली

    WGIP की बैठकों में सामान्यतः—

    • विशेषज्ञों की प्रस्तुतियाँ,
    • सरकारी वक्तव्य,
    • आदिवासी संगठनों के विचार,
    • और मानवाधिकार संबंधी चर्चाएँ

    शामिल होती थीं।

    इसकी विशेषता यह थी कि इसने गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और आदिवासी प्रतिनिधियों की भागीदारी को भी महत्व दिया।


    WGIP के दो मुख्य कार्य

    (1) विकास की समीक्षा (Review of Developments)

    दुनिया के विभिन्न देशों में आदिवासी समुदायों की स्थिति का अध्ययन और समीक्षा।

    (2) नए मानकों का निर्माण (Standard Setting)

    भविष्य के लिए ऐसे अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत विकसित करना जो आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा में सहायक हों।

    इसी प्रक्रिया ने आगे चलकर UNDRIP के मसौदे (Draft Declaration) के विकास को प्रभावित किया।


    क्या पहली बैठक में कोई अंतिम कानून बना?

    • नहीं, 1982 की बैठक का उद्देश्य तत्काल कोई बाध्यकारी कानून बनाना नहीं था।
    • यह एक संवादात्मक और परामर्शात्मक प्रक्रिया की शुरुआत थी, जिसमें विभिन्न देशों और समुदायों के अनुभवों को समझा गया।


    आदिवासी प्रतिनिधियों के लिए इसका महत्व

    WGIP ने पहली बार कई आदिवासी समुदायों को संयुक्त राष्ट्र के मंच तक सीधी पहुँच प्रदान की।

    इससे वे—

    • अपनी समस्याएँ रख सके,
    • अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त कर सके,
    • और वैश्विक नेटवर्क बना सके।

    इसी कारण WGIP को आदिवासी अधिकार आंदोलन के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जाता है।


    1982 से 1993 तक की प्रगति

    WGIP की नियमित बैठकों ने आदिवासी मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय एजेंडा पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    इसी अवधि में—

    • अधिक शोध कार्य हुए,
    • विभिन्न देशों के अनुभव साझा किए गए,
    • और आदिवासी अधिकारों के लिए वैश्विक समर्थन बढ़ा।

    1993: अंतरराष्ट्रीय वर्ष की घोषणा

    WGIP और अन्य पहलों से बढ़ती जागरूकता के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र ने 1993 को International Year of the World's Indigenous People घोषित किया।

    इसका उद्देश्य था—

    • जागरूकता बढ़ाना,
    • सरकारों और समुदायों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना,
    • और आदिवासी अधिकारों पर वैश्विक ध्यान केंद्रित करना।

    1994: विश्व आदिवासी दिवस की घोषणा

    23 दिसंबर 1994 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने निर्णय लिया कि प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को International Day of the World's Indigenous Peoples मनाया जाएगा।

    यह तिथि विशेष रूप से 9 अगस्त 1982 की पहली WGIP बैठक की स्मृति में चुनी गई।


    WGIP का आगे का प्रभाव

    WGIP ने आने वाले वर्षों में कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को प्रभावित किया—

    1. Indigenous Rights पर वैश्विक विमर्श

    पहली बार यह विषय संयुक्त राष्ट्र के नियमित एजेंडे का हिस्सा बना।

    2. Draft Declaration

    WGIP के कार्य ने आगे चलकर United Nations Declaration on the Rights of Indigenous Peoples (UNDRIP) के प्रारूप को प्रभावित किया।

    3. UN Permanent Forum on Indigenous Issues

    बाद में 2000 में स्थापित UNPFII की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करने में भी WGIP की भूमिका मानी जाती है।


    क्या WGIP आज भी अस्तित्व में है?

    WGIP ने कई वर्षों तक कार्य किया और आदिवासी अधिकारों पर महत्वपूर्ण योगदान दिया।

    बाद में संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में नए संस्थागत ढाँचे विकसित हुए, जिनमें UN Permanent Forum on Indigenous Issues (UNPFII) और अन्य तंत्र प्रमुख हैं, जिन्होंने इस क्षेत्र में कार्य को आगे बढ़ाया।


    इतिहास में 9 अगस्त का महत्व

    9 अगस्त केवल एक प्रतीकात्मक तिथि नहीं है।

    यह उस दिन की याद दिलाती है जब पहली बार संयुक्त राष्ट्र ने आदिवासी समुदायों के लिए एक समर्पित अंतरराष्ट्रीय संवाद मंच स्थापित किया और उनकी आवाज़ को वैश्विक स्तर पर सुनने की संस्थागत प्रक्रिया शुरू हुई।


    निष्कर्ष

    • 9 अगस्त 1982 की जिनेवा बैठक विश्व आदिवासी अधिकार आंदोलन के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ थी। Working Group on Indigenous Populations (WGIP) ने पहली बार संयुक्त राष्ट्र के भीतर ऐसा मंच उपलब्ध कराया जहाँ आदिवासी समुदायों के अधिकार, संस्कृति और पहचान पर व्यवस्थित अंतरराष्ट्रीय चर्चा हो सकी। यही प्रक्रिया आगे चलकर 1993 के अंतरराष्ट्रीय वर्ष, 1994 में विश्व आदिवासी दिवस की घोषणा और 2007 के UNDRIP जैसे ऐतिहासिक कदमों की आधारशिला बनी।


    अक्सर पूछने जाने वाले प्रश्न 

    प्रश्न 1: WGIP की स्थापना कब हुई?

    उत्तर: 1982 में संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत।

    प्रश्न 2: पहली बैठक कब आयोजित हुई?

    उत्तर: 9 अगस्त 1982 को जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड) में।

    प्रश्न 3: 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस क्यों मनाया जाता है?

    उत्तर: क्योंकि इसी दिन WGIP की पहली ऐतिहासिक बैठक हुई थी, जिसकी स्मृति में संयुक्त राष्ट्र ने 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में चुना।

    प्रश्न 4: WGIP का मुख्य उद्देश्य क्या था?

    उत्तर: विश्व के आदिवासी समुदायों की स्थिति की समीक्षा करना और उनके अधिकारों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय मानकों के विकास में योगदान देना।