भारत के आदिवासियों का विकास और संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नीति, नियम और कानून | अनुसूचित जनजाति का इतिहास एवं संवैधानिक अधिकार

भारत के आदिवासियों का विकास और संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नीति, नियम और कानून  | अनुसूचित जनजाति का इतिहास एवं संवैधानिक अधिकार



  • भारत विश्व की सबसे बड़ी जनजातीय आबादी वाले देशों में से एक है। देश में सैकड़ों आदिवासी समुदाय अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति, परंपरा और जीवन शैली के साथ निवास करते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने संविधान के माध्यम से आदिवासी समुदायों के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक विकास के लिए अनेक विशेष प्रावधान किए।
  • आज भारतीय संविधान में इन समुदायों को "अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe - ST)" के रूप में मान्यता प्राप्त है और उनके संरक्षण तथा विकास के लिए अनेक कानून एवं योजनाएं लागू हैं।

  • अनुसूचित जनजाति का इतिहास
  • भारत में आदिवासियों के अधिकार
  • आदिवासी संरक्षण कानून
  • अनुसूचित जनजाति क्यों कहा जाता है
  • भारतीय संविधान में जनजातियों के अधिकार
  • आदिवासी विकास योजनाएं
  • ST का संवैधानिक दर्जा

  • 1947 से पहले भारत के आदिवासियों को किस नाम से जाना जाता था?

    • स्वतंत्रता से पहले ब्रिटिश शासन के दौरान विभिन्न समय पर आदिवासी समुदायों के लिए अलग-अलग शब्दों का प्रयोग किया गया।

    1. Aboriginal Tribes (आदिम जनजातियाँ)

    • ब्रिटिश प्रशासन के शुरुआती दस्तावेजों में अनेक समुदायों को "Aboriginal Tribes" अर्थात मूल निवासी जनजातियाँ कहा गया।

    2. Forest Tribes (वनवासी जनजातियाँ)

    • जिन समुदायों का जीवन जंगलों पर आधारित था, उन्हें कई सरकारी अभिलेखों में "Forest Tribes" कहा गया।

    3. Hill Tribes (पर्वतीय जनजातियाँ)

    • पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के लिए "Hill Tribes" शब्द का प्रयोग किया जाता था।

    4. Primitive Tribes (आदिम जनजातियाँ)

    • कुछ ब्रिटिश अधिकारियों ने सामाजिक एवं आर्थिक आधार पर कुछ समूहों को "Primitive Tribes" की श्रेणी में रखा।

    5. Backward Tribes (पिछड़ी जनजातियाँ)

    • 1931 की जनगणना सहित कुछ प्रशासनिक दस्तावेजों में "Backward Tribes" शब्द भी प्रयुक्त हुआ।


    ब्रिटिश काल की जनगणना में आदिवासियों का उल्लेख

    • ब्रिटिश भारत की विभिन्न जनगणनाओं में आदिवासी समुदायों का वर्गीकरण समय-समय पर बदलता रहा।

    1872 की जनगणना

    • पहली व्यापक जनगणना में कई समुदायों को स्थानीय नामों या "Aboriginal Tribes" के रूप में दर्ज किया गया।

    1881 और 1891 की जनगणना

    • कई क्षेत्रों में "Forest Tribes" और "Hill Tribes" जैसे वर्गीकरण देखने को मिले।

    1901 की जनगणना

    • जनजातीय समुदायों को धर्म, क्षेत्र और सामाजिक स्थिति के आधार पर अलग-अलग वर्गों में रखा गया।

    1911 एवं 1921 की जनगणना

    • जनजातीय पहचान को अधिक व्यवस्थित रूप से दर्ज करने का प्रयास किया गया, लेकिन पूरे देश में एक समान वर्गीकरण नहीं था।

    1931 की जनगणना

    • कई समुदायों को "Backward Tribes" अथवा अन्य प्रशासनिक श्रेणियों में शामिल किया गया।

    1941 की जनगणना

    • द्वितीय विश्व युद्ध के कारण यह जनगणना पूर्ण रूप से व्यवस्थित नहीं हो सकी, इसलिए कई क्षेत्रों का डेटा सीमित रहा।

    स्वत्रंत भारत में आदिवासियों को "अनुसूचित जनजाति" (Scheduled Tribe) का दर्जा क्यों दिया गया?

    • स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माताओं ने महसूस किया कि भारत के अनेक जनजातीय समुदाय ऐतिहासिक रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक अवसरों में पिछड़े रहे हैं।
    • इसी कारण संविधान में विशेष प्रावधान किए गए ताकि इन समुदायों को समान अवसर और संरक्षण मिल सके।

    अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के प्रमुख कारण

    1. सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन

    • अनेक जनजातीय समुदाय मुख्यधारा से दूर थे और शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं तक उनकी पहुंच सीमित थी।

    2. भौगोलिक अलगाव

    • अधिकांश समुदाय दुर्गम वन और पर्वतीय क्षेत्रों में रहते थे, जिससे विकास योजनाओं का लाभ कम पहुंच पाता था।

    3. विशिष्ट संस्कृति और पहचान का संरक्षण

    • उनकी भाषा, संस्कृति, परंपरा और जीवन शैली को सुरक्षित रखना आवश्यक माना गया।

    4. भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा

    • खनन, उद्योग और अन्य परियोजनाओं के कारण विस्थापन का खतरा बढ़ रहा था, इसलिए विशेष कानूनी संरक्षण की आवश्यकता महसूस हुई।

    5. समान अवसर सुनिश्चित करना

    • शिक्षा, सरकारी नौकरियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण देकर सामाजिक न्याय स्थापित करने का प्रयास किया गया।


    अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक मान्यता: भारतीय संविधान में अनुसूचित जनजातियों का दर्जा, प्रावधान और महत्व

    • भारत का संविधान सामाजिक न्याय, समानता और समावेशी विकास के सिद्धांतों पर आधारित है। संविधान निर्माताओं ने यह स्वीकार किया कि देश के अनेक आदिवासी समुदाय (Tribal Communities) ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक दृष्टि से वंचित रहे हैं। इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा, सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण और समग्र विकास के लिए संविधान में विशेष प्रावधान किए गए।
    • इसी संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत इन समुदायों को “अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe – ST)” के रूप में मान्यता दी गई।


    अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) क्या है?

    • अनुसूचित जनजाति (ST) भारत के उन जनजातीय समुदायों को कहा जाता है जिन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित (Notify) किया गया है और जिनकी सूची संसद द्वारा संशोधित की जा सकती है।
    • ध्यान देने योग्य बात यह है कि “आदिवासी” एक सामाजिक एवं सांस्कृतिक शब्द है, जबकि “अनुसूचित जनजाति” एक संवैधानिक और कानूनी श्रेणी है। इसलिए हर आदिवासी समुदाय स्वतः अनुसूचित जनजाति नहीं माना जाता; किसी समुदाय को ST का दर्जा तभी प्राप्त होता है जब उसे आधिकारिक सूची में शामिल किया जाए।


    अनुसूचित जनजाति घोषित करने के लिए किन बातों पर विचार किया जाता है?

    भारतीय संविधान में ST घोषित करने के लिए कोई निश्चित मानदंड (Criteria) स्पष्ट रूप से नहीं दिए गए हैं। हालांकि समय के साथ सरकार और संबंधित समितियों द्वारा कुछ विशेषताओं पर विचार किया गया है, जैसे—

    • विशिष्ट जनजातीय संस्कृति
    • पारंपरिक जीवन शैली
    • भौगोलिक अलगाव
    • सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ापन
    • मुख्यधारा से सीमित संपर्क

    ये ऐतिहासिक प्रशासनिक संकेतक रहे हैं, परंतु किसी समुदाय को ST सूची में शामिल करने का अंतिम निर्णय संवैधानिक एवं विधायी प्रक्रिया के अनुसार ही लिया जाता है।

    संविधान सभा ने अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान क्यों किए?

    संविधान निर्माण के समय यह पाया गया कि अनेक जनजातीय समुदाय—

    • दुर्गम वन एवं पर्वतीय क्षेत्रों में निवास करते थे।
    • शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित थे।
    • आर्थिक रूप से अत्यंत कमजोर थे।
    • भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर उनके अधिकार असुरक्षित थे।
    • उनकी विशिष्ट भाषा, संस्कृति और परंपराएँ विलुप्त होने के खतरे में थीं।

    इसीलिए संविधान में ऐसे विशेष प्रावधान जोड़े गए ताकि इन समुदायों को समान अवसर, सुरक्षा और विकास का अधिकार मिल सके।


    अनुच्छेद 342 : अनुसूचित जनजातियों की संवैधानिक मान्यता का आधार

    भारतीय संविधान में अनुच्छेद 342 अनुसूचित जनजातियों की पहचान और अधिसूचना का मुख्य आधार है।

    अनुच्छेद 342(1)

    इस उपबंध के अनुसार—

    • भारत के राष्ट्रपति किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के राज्यपाल से परामर्श करने के बाद उस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के लिए किन समुदायों को अनुसूचित जनजाति माना जाएगा, इसकी अधिसूचना जारी कर सकते हैं।
    • यह अधिसूचना राजपत्र (Official Gazette) में प्रकाशित की जाती है।

    अर्थात किसी समुदाय को ST का दर्जा केवल राष्ट्रपति की अधिसूचना के माध्यम से ही प्राप्त होता है।


    अनुच्छेद 342(2)

    इस प्रावधान के अनुसार—

    • संसद को यह अधिकार है कि वह कानून बनाकर अनुसूचित जनजातियों की सूची में किसी समुदाय को जोड़ सकती है या हटा सकती है।
    • राष्ट्रपति स्वयं अधिसूचना जारी करने के बाद सूची में संशोधन नहीं करते; इसके लिए संसद द्वारा विधायी प्रक्रिया आवश्यक होती है।

    इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सूची में परिवर्तन एक पारदर्शी और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से हो।


    अनुसूचित जनजातियों से संबंधित प्रमुख संवैधानिक अनुच्छेद

    1. अनुच्छेद 15(4)

    राज्य को अनुसूचित जनजातियों सहित सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार देता है।

    उदाहरण:

    • छात्रवृत्ति
    • विशेष शैक्षणिक योजनाएँ
    • आरक्षण

    2. अनुच्छेद 16(4)

    सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण का प्रावधान करता है।

    3. अनुच्छेद 46

    • राज्य को निर्देश देता है कि वह अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों को विशेष रूप से बढ़ावा दे तथा उन्हें सामाजिक अन्याय और शोषण से बचाए।
    • यह संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) का महत्वपूर्ण भाग है।

    4. अनुच्छेद 244

    • यह अनुच्छेद अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है।

    इसके अंतर्गत—

    • पाँचवीं अनुसूची (मुख्यतः मध्य एवं अन्य राज्यों के अनुसूचित क्षेत्र) के बारें में विस्तार से पढ़े 

    पाँचवीं अनुसूची का महत्व

    पाँचवीं अनुसूची उन राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है जहाँ बड़ी संख्या में जनजातीय आबादी निवास करती है।

    इसके प्रमुख उद्देश्य हैं—

    • आदिवासी भूमि की सुरक्षा
    • जनजातीय हितों की रक्षा
    • राज्यपाल को विशेष अधिकार
    • जनजातीय सलाहकार परिषद (Tribes Advisory Council) का गठन
    • स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप प्रशासन
    • छठी अनुसूची (पूर्वोत्तर भारत के कुछ जनजातीय क्षेत्र) के बारें में विस्तार से पढ़े 

    लागू होती हैं।

    छठी अनुसूची का महत्व

    छठी अनुसूची पूर्वोत्तर भारत के कुछ जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष स्वायत्त शासन की व्यवस्था करती है।

    इसके अंतर्गत गठित स्वायत्त जिला परिषदों को अधिकार प्राप्त होते हैं—

    • स्थानीय कानून बनाना
    • भूमि प्रबंधन
    • वन संसाधनों का प्रबंधन
    • पारंपरिक रीति-रिवाजों का संरक्षण
    • स्थानीय न्यायिक व्यवस्थाओं का संचालन

    पाँचवीं और छठी अनुसूची में अंतर

    आधारपाँचवीं अनुसूचीछठी अनुसूची
    लागू क्षेत्रमध्य एवं अन्य राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रपूर्वोत्तर भारत के कुछ जनजातीय क्षेत्र
    संवैधानिक आधारअनुच्छेद 244(1)अनुच्छेद 244(2)
    प्रशासनराज्यपाल और जनजातीय सलाहकार परिषदस्वायत्त जिला परिषद एवं क्षेत्रीय परिषद
    स्वशासनसीमितव्यापक स्थानीय स्वायत्त शासन
    कानून बनाने की शक्तिराज्यपाल के विनियमपरिषदों को विधायी अधिकार
    न्यायिक अधिकारसीमितपारंपरिक न्यायालय स्थापित करने की शक्ति
    वित्तीय अधिकारसीमितकर लगाने और राजस्व प्राप्त करने के अधिकार

    5. अनुच्छेद 275(1)

    • केंद्र सरकार को अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और अनुसूचित क्षेत्रों के विकास के लिए राज्यों को विशेष अनुदान (Grants-in-Aid) देने का अधिकार देता है।

    6. अनुच्छेद 330

    • लोकसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करता है।

    7. अनुच्छेद 332

    • राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है।

    8. अनुच्छेद 335

    • सरकारी सेवाओं में नियुक्ति करते समय अनुसूचित जनजातियों के दावों पर विचार करने का निर्देश देता है, साथ ही प्रशासनिक दक्षता बनाए रखने पर भी बल देता है।

    9. अनुच्छेद 338A

    • इस अनुच्छेद के अंतर्गत राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (National Commission for Scheduled Tribes - NCST) की स्थापना की गई।

    आयोग के प्रमुख कार्य

    • अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों की रक्षा
    • शिकायतों की जांच
    • सरकार को सुझाव देना
    • संवैधानिक सुरक्षा उपायों की निगरानी
    • राष्ट्रपति को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करना

    अनुसूचित जनजातियों को संवैधानिक मान्यता मिलने से क्या लाभ हुए?

    1. शिक्षा में आरक्षण

    • उच्च शिक्षा संस्थानों और सरकारी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण एवं छात्रवृत्ति की सुविधा प्राप्त हुई।

    2. सरकारी नौकरियों में अवसर

    • सरकारी सेवाओं में आरक्षण के माध्यम से रोजगार के अवसर बढ़े।

    3. राजनीतिक प्रतिनिधित्व

    • लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षित सीटों के माध्यम से राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित हुई।

    4. भूमि एवं वन अधिकारों की सुरक्षा

    • विशेष कानूनों के माध्यम से पारंपरिक भूमि और वन संसाधनों पर अधिकारों को कानूनी संरक्षण मिला।

    5. सांस्कृतिक संरक्षण

    • जनजातीय भाषाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को बढ़ावा मिला।

    6. विशेष विकास योजनाएँ

    • आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और आजीविका से संबंधित अनेक योजनाओं का लाभ मिला।


    अनुसूचित जनजाति और आदिवासी में क्या अंतर है?

    आधारआदिवासीअनुसूचित जनजाति (ST)
    प्रकृति   सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहचान    संवैधानिक एवं कानूनी श्रेणी
    आधार  ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिकम      संविधान का अनुच्छेद 342
    मान्यता  सामान्य सामाजिक शब्द    राष्ट्रपति की अधिसूचना द्वारा
    अधिकार  सामान्य नागरिक अधिकार    विशेष संवैधानिक संरक्षण एवं आरक्षण
    सूची   कोई आधिकारिक सूची नहीं     केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित सूची

    भारत में आदिवासियों के संरक्षण हेतु प्रमुख राष्ट्रीय कानून

    1. पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA Act) को विस्तार से पढ़े 

    • ग्राम सभा को अधिक अधिकार
    • प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय भागीदारी
    • पारंपरिक स्वशासन को मान्यता
    • स्थानीय निर्णय प्रक्रिया को मजबूत करना

    2. वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act) को विस्तार से पढ़े 

    • यह कानून वन क्षेत्रों में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के अधिकारों को मान्यता देता है।

    मुख्य अधिकार:

    • व्यक्तिगत वन भूमि अधिकार
    • सामुदायिक वन संसाधन अधिकार
    • लघु वनोपज पर अधिकार
    • सांस्कृतिक एवं धार्मिक स्थलों की सुरक्षा

    3. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989

    इस कानून का उद्देश्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध होने वाले अत्याचारों को रोकना तथा पीड़ितों को कानूनी संरक्षण प्रदान करना है।


    4. भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर अधिनियम, 2013

    • भूमि अधिग्रहण की स्थिति में प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्स्थापन सुनिश्चित करने का प्रयास करता है।


    आदिवासी विकास के लिए प्रमुख राष्ट्रीय नीतियाँ

    जनजातीय उप-योजना (Tribal Sub Plan)

    • इसका उद्देश्य जनजातीय बहुल क्षेत्रों के लिए लक्षित विकास व्यय सुनिश्चित करना है।

    एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS)

    • आदिवासी विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा उपलब्ध कराने की पहल।

    प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महा अभियान (PM-JANMAN)

    • विशेष रूप से अत्यंत कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) के समग्र विकास पर केंद्रित कार्यक्रम।


    राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) को :-   विस्तार से पढ़े 

    • यह आयोग अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों की निगरानी, शिकायतों की जांच और सरकार को सुझाव देने का कार्य करता है।


    आदिवासी संरक्षण के लिए सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम

    • शिक्षा में आरक्षण
    • सरकारी नौकरियों में आरक्षण
    • छात्रवृत्ति योजनाएँ
    • आवासीय विद्यालय
    • कौशल विकास कार्यक्रम
    • स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार
    • वन अधिकारों की मान्यता
    • स्थानीय स्वशासन को बढ़ावा
    • सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण

    वर्तमान समय में प्रमुख चुनौतियाँ

    हालाँकि अनेक नीतियाँ लागू हैं, फिर भी कई क्षेत्रों में चुनौतियाँ बनी हुई हैं—

    • शिक्षा का निम्न स्तर
    • स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी
    • विस्थापन
    • भूमि अधिकार संबंधी विवाद
    • बेरोजगारी
    • पारंपरिक संस्कृति का क्षरण
    • डिजिटल और आर्थिक असमानता

    निष्कर्ष

    • भारत के आदिवासियों के विकास और संरक्षण के लिए संविधान, कानून और सरकारी नीतियों ने एक मजबूत आधार प्रदान किया है। अनुसूचित जनजाति का दर्जा केवल एक प्रशासनिक वर्गीकरण नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को समान अवसर, सामाजिक न्याय और संवैधानिक सुरक्षा उपलब्ध कराने का माध्यम है।
    • फिर भी वास्तविक विकास के लिए आवश्यक है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भूमि अधिकार, सांस्कृतिक संरक्षण और स्थानीय भागीदारी को और अधिक प्रभावी बनाया जाए। तभी संविधान की भावना के अनुरूप आदिवासी समुदायों का समावेशी और सम्मानजनक विकास सुनिश्चित किया जा सके।


    अक्सर पूछे जाने वाले सवाल 

    1. आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा क्यों दिया गया?

    • ऐतिहासिक, सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन के कारण उन्हें विशेष संवैधानिक संरक्षण और समान अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया।

    2. 1947 से पहले आदिवासियों को किस नाम से जाना जाता था?

    • ब्रिटिश काल में विभिन्न संदर्भों में उन्हें Aboriginal Tribes, Forest Tribes, Hill Tribes, Primitive Tribes और Backward Tribes जैसे नामों से संबोधित किया जाता था।

    3. भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद अनुसूचित जनजातियों की सूची से संबंधित है?

    • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 342 अनुसूचित जनजातियों की अधिसूचना और सूची से संबंधित है।

    4. आदिवासियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कानून कौन-कौन से हैं?

    • प्रमुख कानूनों में वन अधिकार अधिनियम, 2006, पेसा अधिनियम, 1996, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 तथा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 शामिल हैं।

    5. क्या सभी आदिवासी स्वतः अनुसूचित जनजाति माने जाते हैं?

    • व्यवहार में "आदिवासी" एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक शब्द है, जबकि "अनुसूचित जनजाति (ST)" एक संवैधानिक एवं कानूनी श्रेणी है। किसी समुदाय को ST का दर्जा तभी प्राप्त होता है जब उसे संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अधिसूचित सूची में शामिल किया गया हो।

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