छत्तीसगढ़ पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 : संपूर्ण जानकारी

 छत्तीसगढ़ पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 : सभी अध्याय एवं धाराओं की संपूर्ण जानकारी

छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम


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  • पंचायत राज अधिनियम 1993
  • परिचय

    छत्तीसगढ़ पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 राज्य में ग्रामीण स्वशासन की स्थापना एवं संचालन के लिए बनाया गया प्रमुख कानून है। इसका उद्देश्य ग्राम स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करना तथा जनता को विकास कार्यों में प्रत्यक्ष भागीदारी प्रदान करना है।

    यह अधिनियम मूल रूप से 24 जनवरी 1994 को अधिसूचित हुआ तथा समय-समय पर इसमें कई संशोधन किए गए हैं।


    अधिनियम के उद्देश्य

    1. ग्राम स्वराज की स्थापना करना।
    2. ग्राम सभा को निर्णय लेने का अधिकार देना।
    3. ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत एवं जिला पंचायत का गठन करना।
    4. स्थानीय विकास योजनाओं का संचालन करना।
    5. अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को विशेष अधिकार प्रदान करना।

    अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ

    • त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था
    • ग्राम सभा को सर्वोच्च स्थानीय संस्था का दर्जा
    • पंचायतों का पाँच वर्ष का कार्यकाल
    • महिलाओं, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण
    • वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार
    • पंचायत चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा
    • ग्राम स्वराज की अवधारणा पर आधारित स्थानीय शासन

    अधिनियम के 15 अध्याय

    अध्याय                 विषय
    अध्याय 1प्रारम्भिक
    अध्याय 2ग्राम सभा
    अध्याय 3पंचायतों का गठन
    अध्याय 4पंचायतों के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष
    अध्याय 5पंचायतों की बैठक एवं कार्यवाही
    अध्याय 6पंचायतों की शक्तियाँ, कर्तव्य एवं कार्य
    अध्याय 7पंचायत निधि एवं वित्त
    अध्याय 8कर, शुल्क एवं उपकर
    अध्याय 9बजट एवं लेखा
    अध्याय 10पंचायत के अधिकारी एवं सेवक
    अध्याय 11निर्वाचन संबंधी प्रावधान
    अध्याय 12निरीक्षण, नियंत्रण एवं विघटन
    अध्याय 13अपराध एवं दण्ड
    अध्याय 14विविध प्रावधान
    अध्याय 14-कअनुसूचित क्षेत्रों के लिए विशेष उपबंध (PESA)
    अध्याय 15निरसन एवं संरक्षण संबंधी प्रावधान

    (नोट :-संशोधनों के कारण कुछ संस्करणों में अध्यायों का क्रम या उप-अध्याय अलग दिखाई दे सकते हैं।)


    अध्याय 1 – प्रारम्भिक

    धारा 1 – संक्षिप्त नाम, विस्तार एवं प्रारम्भ

    मुख्य प्रावधान

    • इस अधिनियम का नाम छत्तीसगढ़ पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 है।
    • यह सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य पर लागू होता है।
    • अनुसूचित क्षेत्रों में यह विशेष प्रावधानों (अध्याय 14-क) के अधीन लागू होता है।
    • अधिसूचना द्वारा लागू किया गया।

    सरल भाषा में

    यह धारा बताती है कि कानून का नाम क्या है, कहाँ लागू होगा और कब से प्रभावी होगा।


    धारा 2 – परिभाषाएँ

    इस धारा में अधिनियम में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ बताए गए हैं।

    प्रमुख परिभाषाएँ

    • ग्राम
    • ग्राम सभा
    • ग्राम पंचायत
    • जनपद पंचायत
    • जिला पंचायत
    • सरपंच
    • उपसरपंच
    • पंच
    • पंचायत क्षेत्र
    • अध्यक्ष
    • मुख्य कार्यपालन अधिकारी
    • सचिव
    • अनुसूचित क्षेत्र

    महत्व

    पूरा अधिनियम इन्हीं परिभाषाओं पर आधारित है, इसलिए यह सबसे महत्वपूर्ण धाराओं में से एक है।


    अध्याय – 2 : ग्राम सभा (धारा 3 से 7)

    • ग्राम सभा पंचायती राज व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है। यह प्रत्यक्ष लोकतंत्र का आधार है, जहाँ ग्राम के सभी पंजीकृत मतदाता स्थानीय शासन में भाग लेते हैं।


    धारा 3 – ग्राम की अधिसूचना (Notification of Village)

    कानूनी प्रावधान

    राज्यपाल राजपत्र (Gazette) में अधिसूचना जारी करके किसी एक गाँव अथवा गाँवों के समूह को इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए "ग्राम" घोषित कर सकता है।

    सरल भाषा में

    यदि किसी क्षेत्र में पंचायत बनानी है, तो सबसे पहले सरकार यह तय करती है कि कौन-सा क्षेत्र एक ग्राम माना जाएगा। यह निर्णय राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना के माध्यम से किया जाता है।

    उदाहरण

    • केवल एक गाँव को ग्राम घोषित किया जा सकता है।
    • छोटे-छोटे दो या तीन गाँवों को मिलाकर भी एक ग्राम बनाया जा सकता है।

    महत्व

    • ग्राम सभा का गठन इसी अधिसूचना के आधार पर होता है।
    • ग्राम पंचायत की सीमाएँ भी इसी से निर्धारित होती हैं।

    धारा 4 – ग्राम की मतदाता सूची (List of Voters of a Village)

    कानूनी प्रावधान

    धारा 3 के अंतर्गत अधिसूचित प्रत्येक ग्राम के लिए मतदाताओं की एक सूची तैयार की जाएगी, जो अधिनियम एवं नियमों के अनुसार होगी।

    सरल भाषा में

    ग्राम सभा का सदस्य बनने के लिए आपका नाम ग्राम की मतदाता सूची में होना आवश्यक है।

    मतदाता सूची का उद्देश्य

    • ग्राम सभा की सदस्यता निर्धारित करना।
    • पंचायत चुनाव कराना।
    • ग्राम सभा की बैठक में मतदान करना।

    धारा 5 – ग्राम के मतदाताओं का पंजीकरण (Registration of Voters)

    कानूनी प्रावधान

    जो व्यक्ति विधानसभा निर्वाचन सूची में पंजीकृत होने के योग्य है या जिसका नाम उसमें दर्ज है तथा जो उस ग्राम का सामान्य निवासी है, उसे ग्राम की मतदाता सूची में पंजीकरण का अधिकार होगा।

    मुख्य नियम

    1. एक व्यक्ति – एक ग्राम

    कोई भी व्यक्ति एक से अधिक ग्रामों की मतदाता सूची में नाम दर्ज नहीं करा सकता।

    2. दोहरी सदस्यता निषिद्ध

    यदि किसी अन्य स्थानीय निकाय की मतदाता सूची में नियमों के अनुसार पंजीकरण के कारण पात्रता समाप्त होती है, तो दोहरा पंजीकरण नहीं होगा।

    सरल उदाहरण

    यदि रामलाल का स्थायी निवास ग्राम अ में है तो वह ग्राम ब की मतदाता सूची में नाम दर्ज नहीं करा सकता।


    धारा 6 – ग्राम सभा की बैठक (Meeting of Gram Sabha)

    यह इस अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण धारा है।

    बैठक की आवृत्ति

    प्रत्येक तीन माह में कम से कम एक ग्राम सभा की बैठक आयोजित करना अनिवार्य है।

    विशेष बैठक

    यदि

    • ग्राम सभा के कुल सदस्यों के एक-तिहाई से अधिक सदस्य लिखित मांग करें,
    • या जनपद पंचायत,
    • या जिला पंचायत,
    • या कलेक्टर निर्देश दे,

    तो 30 दिनों के भीतर विशेष बैठक आयोजित करनी होगी।


    गणपूर्ति (Quorum)

    बैठक के लिए

    • कुल सदस्यों का कम से कम एक-दसवाँ (1/10) उपस्थित होना आवश्यक है।
    • उपस्थित सदस्यों में कम से कम एक-तिहाई महिलाएँ होना आवश्यक है।

    यदि गणपूर्ति पूरी नहीं हो

    बैठक स्थगित कर नई तिथि घोषित की जाएगी।

    स्थगित बैठक में सामान्यतः गणपूर्ति आवश्यक नहीं होती, लेकिन वार्षिक कार्ययोजना, बजट, लेखा परीक्षण रिपोर्ट आदि महत्वपूर्ण प्रस्तावों के लिए आवश्यक गणपूर्ति का होना जरूरी है।


    धारा 7 – ग्राम सभा की शक्तियाँ, कर्तव्य एवं वार्षिक सम्मेलन

    यह ग्राम सभा की सबसे महत्वपूर्ण धारा है क्योंकि इसी में ग्राम सभा के अधिकार निर्धारित किए गए हैं।

    ग्राम सभा के प्रमुख अधिकार

    1. ग्राम विकास योजना का अनुमोदन

    ग्राम पंचायत द्वारा प्रस्तुत विकास योजनाओं पर विचार करना तथा उन्हें स्वीकृति देना।


    2. हितग्राहियों का चयन

    प्रधानमंत्री आवास योजना, मनरेगा, पेंशन योजना तथा अन्य सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों का चयन करना।


    3. पंचायत की आय-व्यय की समीक्षा

    • वार्षिक बजट पर विचार
    • आय एवं व्यय का परीक्षण
    • लेखा प्रतिवेदन की समीक्षा

    4. सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit)

    ग्राम सभा यह देखती है कि सरकारी धन का सही उपयोग हुआ है या नहीं।


    5. सार्वजनिक संपत्तियों का संरक्षण

    • तालाब
    • चरागाह
    • सड़क
    • सामुदायिक भवन
    • श्मशान
    • वन संसाधन

    के संरक्षण में ग्राम सभा की भूमिका महत्वपूर्ण है।


    6. वार्षिक सम्मेलन

    प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ग्राम सभा का वार्षिक सम्मेलन आयोजित किया जाता है, जिसमें निम्न विषयों पर चर्चा होती है—

    • वार्षिक प्रशासनिक प्रतिवेदन
    • वार्षिक लेखा
    • लेखा परीक्षण रिपोर्ट
    • आगामी वर्ष की विकास योजना
    • वार्षिक बजट

    इस अध्याय सार 

    धारा                   विषय
    धारा 3ग्राम की अधिसूचना
    धारा 4ग्राम की मतदाता सूची
    धारा 5मतदाता पंजीकरण
    धारा 6ग्राम सभा की बैठक
    धारा 7ग्राम सभा की शक्तियाँ एवं वार्षिक सम्मेलन



    अध्याय – 3 : पंचायतों की स्थापना, गठन एवं संरचना (धारा 8 से धारा 19)

    नोट: इस अध्याय में यह निर्धारित किया गया है कि ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत और जिला पंचायत का गठन कैसे होगा, उनके सदस्यों की संख्या क्या होगी तथा चुनाव किस प्रकार होंगे।


    धारा 8 – पंचायतों का गठन

    प्रावधान

    राज्य सरकार प्रत्येक स्तर पर पंचायतों का गठन करेगी।

    पंचायतों के तीन स्तर होंगे—

    1. ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर)
    2. जनपद पंचायत (विकासखण्ड स्तर)
    3. जिला पंचायत (जिला स्तर)

    उद्देश्य

    • प्रशासन का विकेंद्रीकरण
    • स्थानीय जनता की भागीदारी
    • विकास योजनाओं का स्थानीय स्तर पर संचालन

    सरल भाषा में

    हर गाँव के लिए ग्राम पंचायत, हर विकासखण्ड के लिए जनपद पंचायत और हर जिले के लिए जिला पंचायत बनाई जाती है।


    धारा 9 – ग्राम पंचायत का गठन

    मुख्य प्रावधान

    प्रत्येक अधिसूचित ग्राम के लिए एक ग्राम पंचायत होगी।

    यदि किसी ग्राम की जनसंख्या अधिक हो तो उसे विभिन्न वार्डों में विभाजित किया जा सकता है।

    ग्राम पंचायत की संरचना

    • सरपंच
    • पंच (वार्ड सदस्य)
    • उपसरपंच (निर्वाचित पंचों द्वारा चुना जाता है)

    उद्देश्य

    ग्राम स्तर पर प्रशासन और विकास कार्यों का संचालन करना।


    धारा 10 – जनपद पंचायत का गठन

    मुख्य प्रावधान

    प्रत्येक विकासखण्ड (ब्लॉक) के लिए एक जनपद पंचायत गठित होगी।

    इसमें विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों से चुने गए सदस्य शामिल होते हैं।

    प्रमुख कार्य

    • ग्राम पंचायतों का समन्वय
    • विकास योजनाओं की निगरानी
    • विभागीय योजनाओं का क्रियान्वयन

    धारा 11 – जिला पंचायत का गठन

    मुख्य प्रावधान

    प्रत्येक जिले में एक जिला पंचायत स्थापित होगी।

    इसमें जिले के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों से निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं।

    प्रमुख कार्य

    • जिले की विकास योजनाओं का निर्माण
    • जनपद पंचायतों का समन्वय
    • जिला स्तर की योजनाओं की निगरानी

    धारा 12 – पंचायत क्षेत्रों का विभाजन

    प्रावधान

    राज्य सरकार जनसंख्या के आधार पर पंचायत क्षेत्रों को वार्डों या निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित कर सकती है।

    उद्देश्य

    • प्रत्येक क्षेत्र को समान प्रतिनिधित्व देना।
    • निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना।

    धारा 13 – वार्डों का निर्धारण

    मुख्य बिंदु

    • प्रत्येक वार्ड से एक पंच चुना जाएगा।
    • वार्डों का निर्धारण जनसंख्या के अनुपात में किया जाएगा।

    उदाहरण

    यदि किसी ग्राम में 3000 की जनसंख्या है, तो उसे आवश्यकतानुसार 10 या 15 वार्डों में विभाजित किया जा सकता है।


    धारा 14 – पंचायतों में आरक्षण

    आरक्षण व्यवस्था

    पंचायतों में निम्न वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान है—

    • अनुसूचित जाति (SC)
    • अनुसूचित जनजाति (ST)
    • अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) (राज्य के प्रावधानानुसार)
    • महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें

    महिलाओं का प्रतिनिधित्व

    पंचायतों में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देकर स्थानीय शासन में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की गई है।


    धारा 15 – सरपंच का निर्वाचन

    प्रावधान

    सरपंच का चुनाव ग्राम के मतदाता प्रत्यक्ष मतदान द्वारा करते हैं।

    सरपंच की भूमिका

    • ग्राम पंचायत का प्रमुख
    • बैठकों की अध्यक्षता
    • विकास कार्यों की निगरानी
    • ग्राम सभा के निर्णयों का पालन

    धारा 16 – उपसरपंच का निर्वाचन

    प्रावधान

    उपसरपंच का चुनाव ग्राम पंचायत के निर्वाचित पंच अपने बीच से करते हैं।

    भूमिका

    • सरपंच की अनुपस्थिति में कार्य करना
    • पंचायत के प्रशासनिक कार्यों में सहयोग देना

    धारा 17 – जनपद पंचायत के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष

    प्रावधान

    जनपद पंचायत के निर्वाचित सदस्य अपने बीच से अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं।

    प्रमुख दायित्व

    • जनपद पंचायत की बैठकों का संचालन
    • योजनाओं की समीक्षा
    • विकास कार्यों की निगरानी

    धारा 18 – जिला पंचायत के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष

    प्रावधान

    जिला पंचायत के निर्वाचित सदस्य अपने मध्य से अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं।

    प्रमुख कार्य

    • जिला पंचायत का नेतृत्व
    • जिला स्तरीय योजनाओं का संचालन
    • विभिन्न विभागों के साथ समन्वय

    धारा 19 – रिक्त स्थानों की पूर्ति

    यदि किसी पंचायत में—

    • सदस्य का निधन हो जाए,
    • इस्तीफा दे दे,
    • अयोग्य घोषित हो जाए,
    • या पद रिक्त हो जाए,

    तो कानून के अनुसार उपचुनाव या अन्य निर्धारित प्रक्रिया द्वारा उस पद को भरा जाएगा।

    इस अध्याय का सार 

    धारा                  विषय
    8पंचायतों का गठन
    9ग्राम पंचायत का गठन
    10जनपद पंचायत का गठन
    11जिला पंचायत का गठन
    12पंचायत क्षेत्रों का विभाजन
    13वार्डों का निर्धारण
    14आरक्षण
    15सरपंच का निर्वाचन
    16उपसरपंच का निर्वाचन
    17जनपद पंचायत अध्यक्ष
    18जिला पंचायत अध्यक्ष
    19रिक्त स्थानों की पूर्ति

    अध्याय – 4 : पंचायतों के पदाधिकारी एवं उनके अधिकार

    • इस अध्याय में सरपंच, उपसरपंच, जनपद पंचायत अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के निर्वाचन, शक्तियों, त्यागपत्र, पद रिक्त होने तथा अविश्वास प्रस्ताव से संबंधित प्रावधानों का वर्णन किया गया है।


    धारा 20 – सरपंच एवं उपसरपंच के अधिकार एवं कर्तव्य

    प्रमुख प्रावधान

    सरपंच ग्राम पंचायत का निर्वाचित प्रमुख होता है तथा ग्राम पंचायत का प्रतिनिधित्व करता है।

    सरपंच के प्रमुख कार्य

    • ग्राम पंचायत की बैठकों की अध्यक्षता करना।
    • ग्राम सभा द्वारा लिए गए निर्णयों का पालन कराना।
    • पंचायत के विकास कार्यों की निगरानी करना।
    • पंचायत निधि के उपयोग पर नियंत्रण रखना।
    • सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की समीक्षा करना।

    उपसरपंच के कार्य

    • सरपंच की अनुपस्थिति में उसके सभी कार्य करना।
    • पंचायत प्रशासन में सहयोग देना।
    • पंचायत के नियमित कार्यों का संचालन करना।

    धारा 21 – अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष (जनपद पंचायत)

    जनपद पंचायत के निर्वाचित सदस्य अपने मध्य से अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं।

    अध्यक्ष के अधिकार

    • जनपद पंचायत की बैठक बुलाना।
    • कार्यसूची निर्धारित करना।
    • विकास योजनाओं की समीक्षा करना।
    • विभिन्न विभागों के साथ समन्वय स्थापित करना।

    उपाध्यक्ष के अधिकार

    अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उसके सभी अधिकार एवं दायित्वों का निर्वहन करना।


    धारा 22 – जिला पंचायत अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष

    जिला पंचायत के निर्वाचित सदस्य अपने मध्य से अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं।

    प्रमुख कार्य

    • जिला पंचायत का संचालन।
    • जिला स्तरीय विकास योजनाओं का समन्वय।
    • जनपद पंचायतों के कार्यों की समीक्षा।
    • जिला पंचायत की बैठकों की अध्यक्षता।

    धारा 23 – पद रिक्त होने की स्थिति

    निम्न परिस्थितियों में पंचायत पदाधिकारी का पद रिक्त माना जाएगा—

    • मृत्यु
    • त्यागपत्र
    • अयोग्यता
    • अविश्वास प्रस्ताव पारित होना
    • न्यायालय द्वारा निर्वाचन निरस्त किया जाना

    धारा 24 – त्यागपत्र

    कोई भी सरपंच, उपसरपंच, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र नियमानुसार सक्षम अधिकारी को प्रस्तुत कर सकता है।

    त्यागपत्र की विशेषताएँ

    • लिखित रूप में दिया जाएगा।
    • सक्षम अधिकारी द्वारा स्वीकार किए जाने के बाद प्रभावी होगा।
    • निर्धारित समय के भीतर वापस लेने का प्रावधान नियमों के अनुसार हो सकता है।

    धारा 25 – अविश्वास प्रस्ताव

    यदि पंचायत के निर्वाचित सदस्यों का बहुमत किसी पदाधिकारी के कार्य से असंतुष्ट हो, तो उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है।

    मुख्य बिंदु

    • निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
    • विशेष बैठक आयोजित की जाती है।
    • आवश्यक बहुमत प्राप्त होने पर पदाधिकारी पद से हट जाता है।

    उद्देश्य

    • पंचायत प्रशासन में जवाबदेही बनाए रखना।
    • लोकतांत्रिक नियंत्रण सुनिश्चित करना।

    धारा 26 – कार्यवाहक व्यवस्था

    यदि किसी कारण से सरपंच या अध्यक्ष का पद रिक्त हो जाए, तो निर्धारित नियमों के अनुसार उपसरपंच या उपाध्यक्ष अथवा सक्षम अधिकारी अस्थायी रूप से कार्यभार संभाल सकता है।


    धारा 27 – पदाधिकारियों की जिम्मेदारी

    प्रत्येक पंचायत पदाधिकारी का दायित्व होगा कि वह—

    • पंचायत निधि का उचित उपयोग करे।
    • पंचायत अभिलेख सुरक्षित रखे।
    • विकास योजनाओं को पारदर्शी ढंग से लागू करे।
    • ग्राम सभा एवं पंचायत के निर्णयों का पालन करे।

    धारा 28 – पद का दुरुपयोग

    यदि कोई पदाधिकारी—

    • अपने अधिकारों का दुरुपयोग करता है,
    • सरकारी धन का दुरुपयोग करता है,
    • भ्रष्टाचार या गंभीर अनियमितता करता है,

    तो सक्षम प्राधिकारी उसके विरुद्ध जांच कर आवश्यक कार्रवाई कर सकता है।


    इस अध्याय का सार

    धारा                   विषय
    20सरपंच एवं उपसरपंच के अधिकार
    21जनपद पंचायत अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष
    22जिला पंचायत अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष
    23पद रिक्त होने की स्थिति
    24त्यागपत्र
    25अविश्वास प्रस्ताव
    26कार्यवाहक व्यवस्था
    27पदाधिकारियों की जिम्मेदारी
    28पद के दुरुपयोग पर कार्रवाई

    अध्याय – 5 : पंचायतों की बैठक, कार्यवाही एवं समितियाँ

    परिचय

    किसी भी पंचायत का प्रभावी संचालन नियमित बैठकों, पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया और विभिन्न स्थायी समितियों के माध्यम से होता है। इस अध्याय में पंचायतों की बैठक बुलाने की प्रक्रिया, गणपूर्ति (Quorum), प्रस्ताव पारित करने की विधि, कार्यवाही लेखन तथा समितियों के गठन से संबंधित प्रावधानों का वर्णन किया गया है।


    धारा 29 – पंचायत की बैठक

    प्रमुख प्रावधान

    प्रत्येक पंचायत अपनी बैठक निर्धारित समय पर आयोजित करेगी।

    उद्देश्य

    • विकास कार्यों की समीक्षा करना।
    • नए प्रस्तावों पर विचार करना।
    • वित्तीय एवं प्रशासनिक निर्णय लेना।
    • जनहित के विषयों पर चर्चा करना।

    सरल भाषा में

    पंचायत बिना बैठक के कोई महत्वपूर्ण निर्णय नहीं ले सकती। प्रत्येक निर्णय बैठक में चर्चा के बाद लिया जाता है।


    धारा 30 – बैठक की सूचना

    बैठक बुलाने से पूर्व सभी सदस्यों को निर्धारित नियमों के अनुसार सूचना देना आवश्यक है।

    सूचना में शामिल विषय

    • बैठक की तिथि
    • समय
    • स्थान
    • कार्यसूची (Agenda)

    महत्व

    इससे प्रत्येक सदस्य को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है और निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी रहती है।


    धारा 31 – गणपूर्ति (Quorum)

    बैठक प्रारंभ करने के लिए न्यूनतम निर्धारित संख्या में सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक होती है।

    यदि गणपूर्ति पूरी न हो

    • बैठक स्थगित की जाएगी।
    • नई तिथि निर्धारित की जाएगी।
    • पुनः बैठक आयोजित की जाएगी।

    उद्देश्य

    कुछ लोगों द्वारा पूरे पंचायत क्षेत्र की ओर से निर्णय लेने की स्थिति से बचना।


    धारा 32 – बैठक की अध्यक्षता

    ग्राम पंचायत

    बैठक की अध्यक्षता सरपंच करेगा।

    सरपंच की अनुपस्थिति में

    उपसरपंच अध्यक्षता करेगा।

    दोनों की अनुपस्थिति में

    उपस्थित सदस्य अपने मध्य से किसी एक सदस्य को उस बैठक के लिए अध्यक्ष चुन सकते हैं।


    धारा 33 – प्रस्ताव पारित करने की प्रक्रिया

    बैठक में प्रस्तुत प्रत्येक प्रस्ताव पर चर्चा के बाद मतदान कराया जाएगा।

    निर्णय का आधार

    • उपस्थित सदस्यों का बहुमत।

    मत बराबर होने की स्थिति

    अध्यक्ष को निर्णायक मत (Casting Vote) देने का अधिकार होगा।


    धारा 34 – कार्यवाही (Proceedings)

    प्रत्येक बैठक की कार्यवाही लिखित रूप में दर्ज की जाएगी।

    कार्यवाही में उल्लेखित बिंदु

    • बैठक की तिथि
    • उपस्थित सदस्य
    • चर्चा किए गए विषय
    • पारित प्रस्ताव
    • मतदान का परिणाम

    महत्व

    भविष्य में किसी विवाद की स्थिति में यही आधिकारिक अभिलेख माना जाता है।


    धारा 35 – कार्यवाही रजिस्टर

    पंचायत को एक स्थायी कार्यवाही रजिस्टर रखना होगा।

    इसमें सभी बैठकों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाएगा।

    लाभ

    • पारदर्शिता बनी रहती है।
    • प्रशासनिक निरीक्षण में सुविधा होती है।
    • नागरिक भी आवश्यकतानुसार जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

    धारा 36 – स्थायी समितियों का गठन

    पंचायत अपने कार्यों के प्रभावी संचालन के लिए विभिन्न समितियों का गठन कर सकती है।

    प्रमुख समितियाँ

    • शिक्षा समिति
    • स्वास्थ्य समिति
    • कृषि समिति
    • निर्माण समिति
    • महिला एवं बाल विकास समिति
    • सामाजिक न्याय समिति

    धारा 37 – समितियों के अधिकार

    समितियाँ अपने विषय से संबंधित मामलों का अध्ययन करती हैं तथा पंचायत को सुझाव देती हैं।

    उदाहरण

    यदि गाँव में पेयजल की समस्या है तो संबंधित समिति स्थिति का निरीक्षण कर पंचायत को रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।


    धारा 38 – समितियों की बैठक

    प्रत्येक समिति अपनी आवश्यकता के अनुसार नियमित बैठक आयोजित करेगी।

    कार्य

    • योजनाओं की समीक्षा
    • प्रगति रिपोर्ट तैयार करना
    • पंचायत को अनुशंसा देना

    धारा 39 – अभिलेखों का संरक्षण

    पंचायत निम्न अभिलेख सुरक्षित रखेगी—

    • बैठक रजिस्टर
    • आय-व्यय रजिस्टर
    • कर वसूली रजिस्टर
    • संपत्ति रजिस्टर
    • योजना संबंधी अभिलेख

    उद्देश्य

    प्रशासनिक पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना।


    धारा 40 – निरीक्षण एवं अभिलेखों का अवलोकन

    सक्षम अधिकारी पंचायत के अभिलेखों का निरीक्षण कर सकता है।

    यदि किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है तो आवश्यक कार्रवाई की जा सकती है।


    इस अध्याय का सार

    धारा              विषय
    29पंचायत की बैठक
    30बैठक की सूचना
    31गणपूर्ति
    32बैठक की अध्यक्षता
    33प्रस्ताव पारित करने की प्रक्रिया
    34कार्यवाही लेखन
    35कार्यवाही रजिस्टर
    36स्थायी समितियों का गठन
    37समितियों के अधिकार
    38समितियों की बैठक
    39अभिलेखों का संरक्षण
    40निरीक्षण एवं अभिलेखों का अवलोकन

    अध्याय – 6 : पंचायतों की शक्तियाँ, कर्तव्य एवं कार्य

    परिचय

    यह अध्याय पूरे अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। इसमें ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत एवं जिला पंचायत को दिए गए प्रशासनिक, विकासात्मक, सामाजिक तथा वित्तीय दायित्वों का उल्लेख किया गया है।

    इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य स्थानीय स्वशासन को मजबूत करना तथा विकास योजनाओं को ग्राम स्तर तक प्रभावी रूप से पहुँचाना है।


    धारा 41 – पंचायतों के सामान्य कर्तव्य

    प्रत्येक पंचायत अपने क्षेत्र के समग्र विकास के लिए उत्तरदायी होगी।

    प्रमुख दायित्व

    • ग्रामीण विकास को बढ़ावा देना।
    • सार्वजनिक सुविधाओं का रखरखाव करना।
    • सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन करना।
    • ग्राम सभा के निर्णयों का पालन करना।

    सरल भाषा में

    पंचायत केवल निर्माण कार्य करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि पूरे गाँव के विकास और प्रशासन की जिम्मेदारी निभाती है।


    धारा 42 – नागरिक सुविधाओं का प्रबंधन

    पंचायत निम्नलिखित सार्वजनिक सुविधाओं की व्यवस्था करेगी—

    • पेयजल
    • सड़क
    • नाली
    • सार्वजनिक प्रकाश व्यवस्था
    • श्मशान एवं कब्रिस्तान
    • सार्वजनिक भवन
    • तालाब एवं कुएँ

    उदाहरण

    यदि किसी गाँव में हैंडपंप खराब हो जाता है, तो उसकी मरम्मत एवं रखरखाव की जिम्मेदारी पंचायत की होगी।


    धारा 43 – स्वच्छता एवं स्वास्थ्य

    पंचायत का दायित्व होगा कि वह—

    • गाँव की स्वच्छता बनाए रखे।
    • कचरा प्रबंधन करे।
    • संक्रामक रोगों की रोकथाम में सहयोग करे।
    • स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम संचालित करे।

    धारा 44 – शिक्षा एवं सामाजिक विकास

    पंचायत निम्न क्षेत्रों में सहयोग करेगी—

    • प्राथमिक शिक्षा का प्रचार
    • विद्यालयों का रखरखाव
    • साक्षरता अभियान
    • महिला एवं बाल विकास कार्यक्रम
    • आंगनबाड़ी गतिविधियों में सहयोग

    धारा 45 – कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था

    पंचायत कृषि विकास के लिए कार्य करेगी।

    प्रमुख कार्य

    • सिंचाई सुविधाओं का विकास
    • कृषि विस्तार कार्यक्रम
    • पशुपालन को प्रोत्साहन
    • मत्स्य पालन का विकास
    • कृषि मेलों एवं प्रशिक्षण का आयोजन

    धारा 46 – प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण

    पंचायत स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए उत्तरदायी होगी।

    प्रमुख क्षेत्र

    • तालाब
    • चारागाह
    • ग्राम वन
    • जल स्रोत
    • सामुदायिक भूमि

    अनुसूचित क्षेत्रों में विशेष महत्व

    ग्राम सभा की सहमति से इन संसाधनों के उपयोग एवं संरक्षण को प्राथमिकता दी जाती है।


    धारा 47 – गरीबी उन्मूलन एवं रोजगार योजनाएँ

    पंचायत विभिन्न सरकारी योजनाओं का संचालन एवं निगरानी करेगी।

    प्रमुख योजनाएँ

    • ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम
    • आवास योजनाएँ
    • स्वरोजगार योजनाएँ
    • सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ

    धारा 48 – सामाजिक न्याय

    पंचायत का दायित्व होगा कि वह—

    • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के हितों की रक्षा करे।
    • महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा दे।
    • कमजोर वर्गों के लिए सरकारी योजनाओं का उचित लाभ सुनिश्चित करे।

    धारा 49 – सार्वजनिक संपत्तियों का संरक्षण

    पंचायत निम्न सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा करेगी—

    • पंचायत भवन
    • विद्यालय भवन
    • तालाब
    • सड़क
    • सामुदायिक भवन
    • खेल मैदान

    यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाता है तो पंचायत उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई कर सकती है।


    धारा 50 – विकास योजनाओं का क्रियान्वयन

    पंचायत केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं को स्थानीय स्तर पर लागू करेगी।

    प्रमुख कार्य

    • लाभार्थियों का चयन
    • कार्यों की निगरानी
    • प्रगति रिपोर्ट तैयार करना
    • ग्राम सभा के समक्ष विवरण प्रस्तुत करना

    ग्राम पंचायत के प्रमुख कार्य

    • जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण
    • स्वच्छता व्यवस्था
    • पेयजल उपलब्ध कराना
    • स्ट्रीट लाइट का रखरखाव
    • ग्राम बाजार का प्रबंधन
    • सार्वजनिक स्थानों की देखरेख

    जनपद पंचायत के प्रमुख कार्य

    • ग्राम पंचायतों का समन्वय
    • विकास योजनाओं की समीक्षा
    • तकनीकी सहायता प्रदान करना
    • ब्लॉक स्तर पर योजनाओं का संचालन

    जिला पंचायत के प्रमुख कार्य

    • जिला विकास योजना तैयार करना
    • विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना
    • जनपद पंचायतों की निगरानी करना
    • जिला स्तरीय योजनाओं का मूल्यांकन करना

    11वीं अनुसूची से संबंध

    इस अध्याय के अधिकांश प्रावधान भारतीय संविधान की 11वीं अनुसूची में दिए गए 29 विषयों पर आधारित हैं, जिनमें प्रमुख रूप से—

    • कृषि
    • लघु सिंचाई
    • पशुपालन
    • ग्रामीण आवास
    • पेयजल
    • स्वास्थ्य
    • शिक्षा
    • महिला एवं बाल विकास
    • गरीबी उन्मूलन
    • सार्वजनिक वितरण प्रणाली

    आदि शामिल हैं।


    परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

    धारा              विषय
    41पंचायतों के सामान्य कर्तव्य
    42नागरिक सुविधाओं का प्रबंधन
    43स्वच्छता एवं स्वास्थ्य
    44शिक्षा एवं सामाजिक विकास
    45कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था
    46प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण
    47गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम
    48सामाजिक न्याय
    49सार्वजनिक संपत्तियों का संरक्षण
    50विकास योजनाओं का क्रियान्वयन

    अध्याय – 7 : पंचायत निधि, आय के स्रोत एवं वित्तीय प्रबंधन

    परिचय

    पंचायतों को अपने विकास कार्यों, प्रशासनिक खर्चों एवं जनकल्याणकारी योजनाओं के संचालन के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। इसी उद्देश्य से अधिनियम में प्रत्येक स्तर की पंचायत के लिए अलग निधि (Fund) की व्यवस्था की गई है।

    इस अध्याय में पंचायत निधि के गठन, आय के स्रोत, अनुदान, व्यय, बजट, लेखा तथा वित्तीय नियंत्रण के संबंध में प्रावधान दिए गए हैं।


    धारा 51 – पंचायत निधि का गठन

    प्रत्येक ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत तथा जिला पंचायत के लिए एक पृथक निधि स्थापित की जाएगी।

    इस निधि में प्राप्त राशि

    • राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान
    • केंद्र सरकार की योजनाओं से प्राप्त राशि
    • कर एवं शुल्क से प्राप्त आय
    • दान एवं अंशदान
    • अन्य वैधानिक आय

    उद्देश्य

    सभी आय एवं व्यय का लेखा एक ही अधिकृत निधि के माध्यम से संचालित करना।


    धारा 52 – पंचायत निधि में जमा होने वाली राशि

    पंचायत को प्राप्त होने वाली प्रत्येक राशि पंचायत निधि में जमा की जाएगी।

    इसमें शामिल हैं

    • पंचायत कर
    • बाजार शुल्क
    • मेला शुल्क
    • जल उपयोग शुल्क
    • भवन किराया
    • सरकारी अनुदान
    • विकास योजनाओं की राशि

    महत्व

    किसी भी सरकारी राशि का निजी उपयोग या अलग खाते में रखना अवैध माना जाएगा।


    धारा 53 – पंचायत निधि का उपयोग

    पंचायत निधि का उपयोग केवल सार्वजनिक एवं विकास कार्यों के लिए किया जाएगा।

    प्रमुख उपयोग

    • सड़क निर्माण
    • नाली निर्माण
    • पेयजल व्यवस्था
    • स्ट्रीट लाइट
    • पंचायत भवन का रखरखाव
    • स्वच्छता कार्यक्रम
    • विकास योजनाओं का संचालन

    धारा 54 – पंचायत की संपत्ति

    पंचायत के स्वामित्व अथवा नियंत्रण में आने वाली सभी संपत्तियाँ पंचायत की संपत्ति मानी जाएंगी।

    उदाहरण

    • पंचायत भवन
    • सार्वजनिक तालाब
    • बाजार परिसर
    • धर्मशाला
    • चारागाह भूमि
    • सामुदायिक भवन

    पंचायत का दायित्व

    इन संपत्तियों का संरक्षण, रखरखाव एवं उचित उपयोग सुनिश्चित करना।


    धारा 55 – अनुदान एवं सहायता

    राज्य सरकार समय-समय पर पंचायतों को अनुदान प्रदान कर सकती है।

    अनुदान के प्रकार

    • सामान्य अनुदान
    • विशेष अनुदान
    • विकास अनुदान
    • आपदा सहायता
    • वित्त आयोग आधारित अनुदान

    धारा 56 – व्यय का नियंत्रण

    पंचायत निधि से व्यय केवल सक्षम अधिकारी की स्वीकृति एवं निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाएगा।

    आवश्यक सिद्धांत

    • पारदर्शिता
    • उत्तरदायित्व
    • वित्तीय अनुशासन

    धारा 57 – पंचायत का बजट

    प्रत्येक वित्तीय वर्ष प्रारंभ होने से पूर्व पंचायत अपना वार्षिक बजट तैयार करेगी।

    बजट में शामिल होंगे

    • अनुमानित आय
    • प्रस्तावित व्यय
    • विकास योजनाएँ
    • प्रशासनिक व्यय
    • रखरखाव व्यय

    ग्राम सभा की भूमिका

    ग्राम पंचायत के बजट पर ग्राम सभा विचार कर सकती है और सुझाव दे सकती है।


    धारा 58 – लेखा संधारण

    पंचायत सभी आय एवं व्यय का नियमित लेखा रखेगी।

    प्रमुख अभिलेख

    • नकद पुस्तिका
    • रसीद पुस्तिका
    • व्यय रजिस्टर
    • बैंक पासबुक
    • संपत्ति रजिस्टर
    • योजना रजिस्टर

    धारा 59 – लेखा परीक्षण (Audit)

    पंचायत के खातों का समय-समय पर अधिकृत अधिकारी द्वारा लेखा परीक्षण किया जाएगा।

    लेखा परीक्षण का उद्देश्य

    • वित्तीय अनियमितता रोकना
    • सार्वजनिक धन का सही उपयोग सुनिश्चित करना
    • भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रखना

    धारा 60 – वित्तीय उत्तरदायित्व

    यदि कोई पदाधिकारी या कर्मचारी पंचायत निधि का दुरुपयोग करता है या वित्तीय नुकसान पहुँचाता है, तो उससे राशि की वसूली की जा सकती है तथा उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।


    पंचायतों की आय के प्रमुख स्रोत

    ग्राम पंचायत

    • भवन कर
    • बाजार शुल्क
    • जल कर
    • सफाई शुल्क
    • पंचायत संपत्तियों का किराया
    • राज्य अनुदान

    जनपद पंचायत

    • राज्य सरकार से अनुदान
    • योजना मद की राशि
    • विशेष परियोजनाओं की सहायता

    जिला पंचायत

    • राज्य एवं केंद्र सरकार की योजनाएँ
    • वित्त आयोग अनुदान
    • विकास निधि
    • अन्य वैधानिक आय

    वित्तीय पारदर्शिता के सिद्धांत

    1. प्रत्येक आय का रिकॉर्ड रखा जाएगा।
    2. प्रत्येक व्यय का बिल एवं वाउचर सुरक्षित रखा जाएगा।
    3. पंचायत निधि का उपयोग निजी कार्यों में नहीं किया जा सकता।
    4. नियमित ऑडिट कराया जाएगा।
    5. ग्राम सभा के समक्ष वित्तीय जानकारी प्रस्तुत की जा सकती है।

    धारा              विषय
    51पंचायत निधि का गठन
    52निधि में जमा होने वाली राशि
    53पंचायत निधि का उपयोग
    54पंचायत की संपत्ति
    55अनुदान एवं सहायता
    56व्यय का नियंत्रण
    57वार्षिक बजट
    58लेखा संधारण
    59लेखा परीक्षण
    60वित्तीय उत्तरदायित्व

    अध्याय – 8 : कर, उपकर, शुल्क एवं फीस

    परिचय

    किसी भी पंचायत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए केवल सरकारी अनुदान पर्याप्त नहीं होता। इसलिए अधिनियम पंचायतों को कुछ स्थानीय कर, शुल्क एवं फीस लगाने तथा उनकी वसूली करने का अधिकार प्रदान करता है।

    इस अध्याय का उद्देश्य पंचायतों की वित्तीय स्थिति को मजबूत करना तथा स्थानीय विकास कार्यों के लिए स्वयं संसाधन जुटाना है।


    धारा 61 – कर लगाने की शक्ति

    प्रावधान

    ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत तथा जिला पंचायत अधिनियम एवं नियमों के अनुसार अपने क्षेत्र में निर्धारित कर लगा सकती हैं।

    मुख्य उद्देश्य

    • स्थानीय विकास के लिए धन एकत्र करना।
    • पंचायत को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना।
    • बाहरी अनुदानों पर निर्भरता कम करना।

    धारा 62 – अनिवार्य कर

    कुछ कर ऐसे होते हैं जिन्हें राज्य सरकार के निर्देशानुसार पंचायत को लगाना आवश्यक हो सकता है।

    उदाहरण

    • भवन कर
    • प्रकाश कर
    • स्वच्छता कर
    • जल उपयोग कर

    महत्व

    इन करों से प्राप्त राशि का उपयोग सीधे स्थानीय सुविधाओं के विकास में किया जाता है।


    धारा 63 – वैकल्पिक कर एवं शुल्क

    पंचायत अपनी आवश्यकता के अनुसार कुछ अतिरिक्त शुल्क लगा सकती है।

    उदाहरण

    • बाजार शुल्क
    • हाट शुल्क
    • मेला शुल्क
    • पशु बाजार शुल्क
    • वाहन प्रवेश शुल्क (जहाँ नियम लागू हों)

    धारा 64 – लाइसेंस एवं अनुज्ञप्ति शुल्क

    पंचायत अपने क्षेत्र में संचालित कुछ व्यवसायों एवं गतिविधियों के लिए लाइसेंस जारी कर सकती है तथा उसके लिए शुल्क निर्धारित कर सकती है।

    उदाहरण

    • दुकान
    • होटल
    • ढाबा
    • गोदाम
    • व्यापारिक प्रतिष्ठान

    धारा 65 – कर निर्धारण की प्रक्रिया

    कोई भी कर मनमाने ढंग से नहीं लगाया जा सकता।

    प्रक्रिया

    1. प्रस्ताव तैयार किया जाएगा।
    2. पंचायत में विचार होगा।
    3. नियमों के अनुसार स्वीकृति प्राप्त होगी।
    4. सार्वजनिक सूचना जारी की जाएगी।
    5. उसके बाद कर लागू होगा।

    धारा 66 – कर का निर्धारण एवं मूल्यांकन

    कर निर्धारित करते समय निम्न बातों का ध्यान रखा जाएगा—

    • संपत्ति का प्रकार
    • उपयोग
    • क्षेत्रफल
    • स्थानीय नियम
    • पंचायत द्वारा निर्धारित दरें

    उद्देश्य

    समान परिस्थितियों वाले लोगों पर समान कर लगाया जाए।


    धारा 67 – कर में छूट

    कुछ व्यक्तियों या संस्थाओं को नियमों के अनुसार कर में छूट दी जा सकती है।

    संभावित श्रेणियाँ

    • सरकारी भवन
    • सार्वजनिक उपयोग की संस्थाएँ
    • धर्मार्थ संस्थाएँ
    • राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य संस्थाएँ

    धारा 68 – कर की वसूली

    पंचायत निर्धारित समय सीमा के भीतर कर की वसूली करेगी।

    वसूली के माध्यम

    • नकद भुगतान
    • अधिकृत रसीद
    • बैंक जमा
    • नियमों के अनुसार अन्य माध्यम

    विशेष ध्यान

    हर भुगतान के बदले अधिकृत रसीद देना अनिवार्य है।


    धारा 69 – बकाया कर की वसूली

    यदि कोई व्यक्ति निर्धारित समय पर कर जमा नहीं करता है तो पंचायत नियमानुसार बकाया राशि की वसूली कर सकती है।

    संभावित उपाय

    • नोटिस जारी करना
    • अतिरिक्त शुल्क लगाना
    • विधि अनुसार वसूली की कार्रवाई करना

    धारा 70 – कर विवाद एवं अपील

    यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उस पर गलत कर लगाया गया है या कर की राशि अधिक निर्धारित की गई है, तो वह सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपील कर सकता है।

    अपील का उद्देश्य

    • नागरिकों के अधिकारों की रक्षा
    • निष्पक्ष कर व्यवस्था
    • प्रशासनिक पारदर्शिता

    पंचायतों द्वारा वसूले जाने वाले प्रमुख शुल्क

    ग्राम पंचायत

    • भवन कर
    • जल कर
    • सफाई शुल्क
    • बाजार शुल्क
    • मेला शुल्क
    • पंचायत भवन किराया

    जनपद पंचायत

    • विकास परियोजनाओं से संबंधित शुल्क
    • लाइसेंस शुल्क
    • सेवा शुल्क

    जिला पंचायत

    • राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त अधिकारों के अनुसार शुल्क एवं उपकर

    कर व्यवस्था के मूल सिद्धांत

    1. कर केवल विधि द्वारा लगाया जाएगा।
    2. सभी करों का रिकॉर्ड पंचायत अभिलेखों में रखा जाएगा।
    3. कर से प्राप्त राशि पंचायत निधि में जमा होगी।
    4. कर की राशि का उपयोग सार्वजनिक विकास कार्यों में किया जाएगा।
    5. नागरिकों को अपील का अधिकार प्राप्त होगा।

    इस अध्याय का सार

    धारा          विषय
    61कर लगाने की शक्ति
    62अनिवार्य कर
    63वैकल्पिक कर एवं शुल्क
    64लाइसेंस शुल्क
    65कर निर्धारण प्रक्रिया
    66कर मूल्यांकन
    67कर में छूट
    68कर वसूली
    69बकाया कर की वसूली
    70अपील

    अध्याय – 9 : बजट, लेखा एवं लेखा परीक्षण

    परिचय

    किसी भी पंचायत की सफलता केवल विकास कार्यों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसकी वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी निर्भर करती है। इसलिए इस अध्याय में पंचायतों के बजट निर्माण, आय-व्यय के लेखे, खातों के संधारण तथा लेखा परीक्षण (ऑडिट) से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।

    इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पंचायत का प्रत्येक रुपया सार्वजनिक हित में और नियमों के अनुसार खर्च हो।


    धारा 71 – वार्षिक बजट तैयार करना

    प्रमुख प्रावधान

    प्रत्येक ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत एवं जिला पंचायत प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारंभ से पहले अपना वार्षिक बजट तैयार करेगी।

    बजट में शामिल विषय

    • अनुमानित आय
    • अनुमानित व्यय
    • विकास योजनाएँ
    • प्रशासनिक व्यय
    • निर्माण कार्य
    • रखरखाव व्यय

    महत्व

    बिना स्वीकृत बजट के पंचायत कोई नया वित्तीय दायित्व नहीं ले सकती।


    धारा 72 – बजट का अनुमोदन

    तैयार किया गया बजट नियमानुसार सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

    उद्देश्य

    • अनावश्यक व्यय रोकना
    • वित्तीय अनुशासन बनाए रखना
    • विकास योजनाओं को प्राथमिकता देना

    धारा 73 – आय एवं व्यय का लेखा

    प्रत्येक पंचायत अपनी सभी आय एवं व्यय का नियमित अभिलेख रखेगी।

    इसमें शामिल होंगे

    • नकद प्राप्ति
    • बैंक जमा
    • सरकारी अनुदान
    • कर एवं शुल्क
    • निर्माण कार्यों का भुगतान
    • वेतन एवं अन्य प्रशासनिक व्यय

    धारा 74 – लेखा पुस्तकों का संधारण

    पंचायत को निम्न अभिलेख नियमित रूप से संधारित करने होंगे—

    • नकद पुस्तिका (Cash Book)
    • रसीद पुस्तिका
    • भुगतान पंजिका
    • बैंक पासबुक
    • स्टॉक रजिस्टर
    • संपत्ति रजिस्टर
    • निर्माण कार्य रजिस्टर

    उद्देश्य

    प्रत्येक वित्तीय लेन-देन का प्रमाण सुरक्षित रखना।


    धारा 75 – लेखा परीक्षण (Audit)

    पंचायत के खातों का समय-समय पर अधिकृत अधिकारी द्वारा ऑडिट किया जाएगा।

    ऑडिट का उद्देश्य

    • सार्वजनिक धन की सुरक्षा
    • अनियमितताओं का पता लगाना
    • वित्तीय अनुशासन बनाए रखना
    • भ्रष्टाचार की रोकथाम

    धारा 76 – ऑडिट आपत्तियाँ

    यदि लेखा परीक्षण में कोई त्रुटि या अनियमितता पाई जाती है तो ऑडिट अधिकारी आपत्ति दर्ज करेगा।

    संभावित आपत्तियाँ

    • बिना स्वीकृति व्यय
    • बिल या वाउचर का अभाव
    • अधिक भुगतान
    • नियमों के विरुद्ध भुगतान
    • सरकारी धन का दुरुपयोग

    धारा 77 – ऑडिट आपत्तियों का निराकरण

    पंचायत को निर्धारित अवधि में ऑडिट आपत्तियों का उत्तर देना होगा।

    यदि गलती सिद्ध होती है तो—

    • सुधारात्मक कार्रवाई की जाएगी।
    • आवश्यक होने पर राशि की वसूली की जाएगी।
    • संबंधित अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।

    धारा 78 – वित्तीय उत्तरदायित्व

    पंचायत के पदाधिकारी एवं कर्मचारी सार्वजनिक धन के संरक्षण के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे।

    यदि उनकी लापरवाही या कदाचार से पंचायत को आर्थिक नुकसान होता है तो नियमानुसार उनसे क्षतिपूर्ति कराई जा सकती है।


    धारा 79 – निरीक्षण

    राज्य सरकार अथवा अधिकृत अधिकारी पंचायत के अभिलेखों, योजनाओं एवं वित्तीय लेन-देन का निरीक्षण कर सकते हैं।

    निरीक्षण के उद्देश्य

    • विकास कार्यों की गुणवत्ता जाँचना
    • वित्तीय स्थिति की समीक्षा
    • योजनाओं की प्रगति का मूल्यांकन
    • नियमों के पालन की पुष्टि

    धारा 80 – विशेष जांच

    यदि किसी पंचायत में भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता या सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की शिकायत प्राप्त होती है तो सक्षम प्राधिकारी विशेष जांच का आदेश दे सकता है।

    जांच के संभावित परिणाम

    • वित्तीय वसूली
    • अनुशासनात्मक कार्रवाई
    • पद से हटाया जाना
    • कानूनी कार्रवाई

    बजट निर्माण के मूल सिद्धांत

    1. आय के अनुरूप व्यय की योजना।
    2. विकास कार्यों को प्राथमिकता।
    3. अनावश्यक खर्च पर नियंत्रण।
    4. सार्वजनिक धन का पारदर्शी उपयोग।
    5. प्रत्येक भुगतान का अभिलेखीकरण।

    पंचायत सचिव एवं सरपंच की भूमिका

    सरपंच

    • बजट पर विचार
    • विकास प्राथमिकताएँ तय करना
    • पंचायत की बैठकों में बजट प्रस्तुत करना

    सचिव

    • लेखा संधारण
    • रजिस्टर सुरक्षित रखना
    • भुगतान अभिलेख तैयार करना
    • ऑडिट के लिए अभिलेख उपलब्ध कराना

    इस अध्याय का सार

    धारा          विषय
    71वार्षिक बजट
    72बजट अनुमोदन
    73आय एवं व्यय का लेखा
    74लेखा पुस्तकों का संधारण
    75लेखा परीक्षण
    76ऑडिट आपत्तियाँ
    77ऑडिट आपत्तियों का निराकरण
    78वित्तीय उत्तरदायित्व
    79निरीक्षण
    80विशेष जांच

    अध्याय – 10 : पंचायत के अधिकारी एवं कर्मचारी

    परिचय

    पंचायत केवल निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से नहीं चलती, बल्कि इसके सुचारू संचालन के लिए विभिन्न अधिकारी एवं कर्मचारी नियुक्त किए जाते हैं। ये अधिकारी पंचायत के प्रशासनिक, वित्तीय एवं विकासात्मक कार्यों को कानून एवं शासन के निर्देशों के अनुसार संपादित करते हैं।

    इस अध्याय में पंचायत सचिव, मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO), अन्य अधिकारियों एवं कर्मचारियों की नियुक्ति, शक्तियाँ, कर्तव्य तथा उत्तरदायित्व का उल्लेख किया गया है।


    धारा 81 – पंचायत के अधिकारी एवं कर्मचारी

    प्रमुख प्रावधान

    प्रत्येक पंचायत में शासन द्वारा आवश्यकतानुसार अधिकारी एवं कर्मचारी नियुक्त किए जा सकते हैं।

    प्रमुख पद

    • पंचायत सचिव
    • मुख्य कार्यपालन अधिकारी (जनपद पंचायत)
    • मुख्य कार्यपालन अधिकारी (जिला पंचायत)
    • लेखापाल
    • लिपिक
    • रोजगार सहायक (अन्य योजनाओं के अनुसार)
    • तकनीकी सहायक

    उद्देश्य

    पंचायत प्रशासन को नियमित एवं व्यवस्थित रूप से संचालित करना।


    धारा 82 – पंचायत सचिव

    पंचायत सचिव की भूमिका

    पंचायत सचिव ग्राम पंचायत का प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी होता है।

    प्रमुख कर्तव्य

    • पंचायत की बैठक का कार्यवृत्त तैयार करना।
    • अभिलेखों का संधारण करना।
    • पंचायत निधि का लेखा रखना।
    • कर एवं शुल्क का रिकॉर्ड रखना।
    • शासन के निर्देशों का पालन कराना।
    • विभिन्न योजनाओं की जानकारी सुरक्षित रखना।

    महत्व

    पंचायत सचिव पंचायत प्रशासन की रीढ़ माना जाता है।


    धारा 83 – मुख्य कार्यपालन अधिकारी (Chief Executive Officer)

    जनपद पंचायत

    मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत के प्रशासनिक कार्यों का संचालन करता है।

    जिला पंचायत

    जिला पंचायत का मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला स्तर की योजनाओं एवं प्रशासन का समन्वय करता है।

    प्रमुख कार्य

    • पंचायतों की निगरानी
    • विकास योजनाओं का क्रियान्वयन
    • बजट एवं वित्तीय नियंत्रण
    • शासन एवं पंचायत के बीच समन्वय

    धारा 84 – अधिकारियों के कर्तव्य

    पंचायत के प्रत्येक अधिकारी का दायित्व होगा कि वह—

    • कानून के अनुसार कार्य करे।
    • पंचायत के अभिलेख सुरक्षित रखे।
    • सार्वजनिक धन का संरक्षण करे।
    • पंचायत के निर्णयों का पालन करे।
    • जनता के प्रति जवाबदेह रहे।

    धारा 85 – कर्मचारियों पर नियंत्रण

    पंचायत के अधिकारी एवं कर्मचारी अपने-अपने सक्षम प्राधिकारी के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण में कार्य करेंगे।

    नियंत्रण का उद्देश्य

    • अनुशासन बनाए रखना।
    • कार्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना।
    • भ्रष्टाचार एवं अनियमितता रोकना।

    धारा 86 – अभिलेखों का संरक्षण

    प्रत्येक अधिकारी एवं कर्मचारी का दायित्व होगा कि वह पंचायत के सभी दस्तावेज एवं अभिलेख सुरक्षित रखे।

    प्रमुख अभिलेख

    • बैठक रजिस्टर
    • नकद पुस्तिका
    • संपत्ति रजिस्टर
    • निर्माण कार्य रजिस्टर
    • योजना रजिस्टर
    • कर वसूली रजिस्टर

    धारा 87 – पद छोड़ते समय अभिलेखों का हस्तांतरण

    यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी स्थानांतरित होता है, सेवानिवृत्त होता है अथवा पद छोड़ता है, तो उसे सभी अभिलेख, संपत्ति एवं सरकारी सामग्री विधिवत हस्तांतरित करनी होगी।

    उद्देश्य

    प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखना।


    धारा 88 – लोक सेवक का दर्जा

    पंचायत के अधिकारी एवं कर्मचारी अपने आधिकारिक कार्यों के संबंध में भारतीय दंड कानूनों के अंतर्गत लोक सेवक (Public Servant) माने जाएंगे।

    परिणाम

    • भ्रष्टाचार या कर्तव्य की उपेक्षा पर उनके विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई की जा सकती है।
    • उन्हें सार्वजनिक पद की गरिमा एवं निष्पक्षता बनाए रखनी होगी।

    धारा 89 – अनुशासनात्मक कार्रवाई

    यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी—

    • कर्तव्य में लापरवाही करता है,
    • सरकारी धन का दुरुपयोग करता है,
    • आदेशों की अवहेलना करता है,
    • भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है,

    तो उसके विरुद्ध नियमानुसार विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।

    संभावित कार्रवाई

    • चेतावनी
    • वेतनवृद्धि रोकना
    • निलंबन
    • सेवा से पृथक्करण
    • आर्थिक वसूली

    धारा 90 – शासन को प्रतिवेदन

    पंचायत के अधिकारी समय-समय पर शासन अथवा सक्षम प्राधिकारी को आवश्यक प्रतिवेदन, प्रगति रिपोर्ट एवं वित्तीय विवरण प्रस्तुत करेंगे।

    उद्देश्य

    • विकास कार्यों की निगरानी
    • योजनाओं का मूल्यांकन
    • वित्तीय पारदर्शिता
    • प्रशासनिक उत्तरदायित्व

    पंचायत सचिव के महत्वपूर्ण कार्य (विशेष अध्ययन)

    1. ग्राम सभा की सूचना जारी करना।
    2. बैठक की कार्यवाही लिखना।
    3. पंचायत की नकद पुस्तिका संधारित करना।
    4. पंचायत निधि का हिसाब रखना।
    5. कर एवं शुल्क का रिकॉर्ड तैयार करना।
    6. विकास योजनाओं की प्रगति रिपोर्ट बनाना।
    7. शासन के आदेशों का पालन सुनिश्चित करना।

    इस अध्याय का सार

    धारा             विषय
    81पंचायत के अधिकारी एवं कर्मचारी
    82पंचायत सचिव
    83मुख्य कार्यपालन अधिकारी
    84अधिकारियों के कर्तव्य
    85कर्मचारियों पर नियंत्रण
    86अभिलेखों का संरक्षण
    87अभिलेखों का हस्तांतरण
    88लोक सेवक का दर्जा
    89अनुशासनात्मक कार्रवाई
    90शासन को प्रतिवेदन

    अध्याय – 11 : पंचायत निर्वाचन, निर्वाचन क्षेत्र एवं निर्वाचन प्रक्रिया

    परिचय

    पंचायती राज व्यवस्था का आधार लोकतांत्रिक चुनाव है। प्रत्येक ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत एवं जिला पंचायत के प्रतिनिधियों का निर्वाचन निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कराया जाता है। इस अध्याय में निर्वाचन क्षेत्रों के गठन, मतदाता सूची, उम्मीदवारों की योग्यता, निर्वाचन प्रक्रिया, निर्वाचन विवाद तथा रिक्त पदों की पूर्ति से संबंधित प्रावधानों का वर्णन किया गया है।


    धारा 91 – पंचायत निर्वाचन का अधीक्षण

    प्रमुख प्रावधान

    पंचायतों के सभी चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन एवं नियंत्रण राज्य निर्वाचन आयोग के अधीन होगा।

    राज्य निर्वाचन आयोग के प्रमुख कार्य

    • निर्वाचन कार्यक्रम घोषित करना।
    • निर्वाचन क्षेत्रों की सूची प्रकाशित करना।
    • मतदाता सूची तैयार कराना।
    • स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना।
    • निर्वाचन परिणाम घोषित करना।

    धारा 92 – निर्वाचन क्षेत्र (Ward/Constituency)

    प्रत्येक पंचायत क्षेत्र को जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाएगा।

    उद्देश्य

    • प्रत्येक नागरिक को समान प्रतिनिधित्व प्रदान करना।
    • निर्वाचन प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाना।

    धारा 93 – मतदाता सूची

    निर्वाचन के लिए अधिकृत मतदाता सूची का उपयोग किया जाएगा।

    मतदाता बनने की शर्तें

    • भारतीय नागरिक होना।
    • निर्धारित आयु (18 वर्ष या अधिक) पूर्ण होना।
    • संबंधित पंचायत क्षेत्र का निवासी होना।
    • मतदाता सूची में नाम दर्ज होना।

    धारा 94 – उम्मीदवार की योग्यता

    पंचायत चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति को अधिनियम एवं नियमों में निर्धारित योग्यता पूरी करनी होगी।

    सामान्य योग्यताएँ

    • संबंधित पंचायत क्षेत्र का पात्र मतदाता होना।
    • विधि द्वारा अयोग्य घोषित न होना।
    • निर्धारित आरक्षण श्रेणी की सीट होने पर संबंधित श्रेणी से होना।

    धारा 95 – उम्मीदवार की अयोग्यता

    निम्न परिस्थितियों में व्यक्ति चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो सकता है—

    • भ्रष्ट आचरण का दोषी होना।
    • सक्षम न्यायालय द्वारा अयोग्य घोषित होना।
    • अधिनियम में वर्णित अन्य अयोग्यताएँ।
    • लाभ के ऐसे पद पर होना जहाँ कानून रोक लगाता हो।

    धारा 96 – नामांकन पत्र

    निर्वाचन लड़ने के इच्छुक व्यक्ति को निर्धारित प्रपत्र में नामांकन पत्र प्रस्तुत करना होगा।

    नामांकन में आवश्यक विवरण

    • उम्मीदवार का नाम
    • निर्वाचन क्षेत्र
    • आयु
    • श्रेणी
    • आवश्यक घोषणा
    • प्रस्तावक का विवरण (जहाँ लागू हो)

    धारा 97 – नामांकन पत्रों की जांच

    निर्धारित तिथि पर निर्वाचन अधिकारी नामांकन पत्रों की जांच करेगा।

    जांच के उद्देश्य

    • पात्रता की पुष्टि
    • आवश्यक दस्तावेजों का सत्यापन
    • त्रुटिपूर्ण नामांकन निरस्त करना

    धारा 98 – नाम वापस लेना

    जांच के बाद निर्धारित अवधि के भीतर उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकता है।

    इसके बाद अंतिम उम्मीदवारों की सूची प्रकाशित की जाती है।


    धारा 99 – मतदान

    मतदान राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कराया जाएगा।

    मतदान के मूल सिद्धांत

    • गुप्त मतदान
    • स्वतंत्र मतदान
    • निष्पक्ष मतदान
    • सभी पात्र मतदाताओं को मतदान का अधिकार

    धारा 100 – मतगणना एवं परिणाम

    मतदान समाप्त होने के बाद निर्धारित स्थान पर मतगणना की जाएगी।

    परिणाम

    जिस उम्मीदवार को वैध मतों का सर्वाधिक समर्थन प्राप्त होगा, उसे निर्वाचित घोषित किया जाएगा।


    धारा 101 – निर्वाचन विवाद

    यदि किसी उम्मीदवार या मतदाता को निर्वाचन प्रक्रिया पर आपत्ति हो, तो वह अधिनियम में निर्धारित सक्षम प्राधिकारी के समक्ष निर्वाचन याचिका प्रस्तुत कर सकता है।

    विवाद के आधार

    • गलत मतगणना
    • भ्रष्ट आचरण
    • गलत नामांकन स्वीकार करना
    • निर्वाचन प्रक्रिया में अनियमितता

    धारा 102 – उपचुनाव

    यदि किसी कारण से कोई पद रिक्त हो जाए—

    • मृत्यु
    • त्यागपत्र
    • अयोग्यता
    • निर्वाचन निरस्त होना

    तो शेष कार्यकाल के लिए उपचुनाव कराया जा सकता है।


    पंचायत चुनाव के प्रमुख सिद्धांत

    1. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार।
    2. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव।
    3. आरक्षण व्यवस्था का पालन।
    4. गुप्त मतदान।
    5. राज्य निर्वाचन आयोग का नियंत्रण।

    इस अध्याय का सार

    धारा                   विषय
    91निर्वाचन का अधीक्षण
    92निर्वाचन क्षेत्र
    93मतदाता सूची
    94उम्मीदवार की योग्यता
    95उम्मीदवार की अयोग्यता
    96नामांकन पत्र
    97नामांकन की जांच
    98नाम वापसी
    99मतदान
    100मतगणना एवं परिणाम
    101निर्वाचन विवाद
    102उपचुनाव

    अध्याय – 12 : पंचायतों पर नियंत्रण, निरीक्षण, निलंबन एवं विघटन

    परिचय

    पंचायती राज व्यवस्था लोकतांत्रिक प्रणाली पर आधारित है, लेकिन पंचायतें पूर्णतः स्वतंत्र नहीं होतीं। उनकी कार्यप्रणाली कानून के अनुरूप रहे, सार्वजनिक धन का दुरुपयोग न हो तथा विकास कार्य प्रभावी ढंग से संचालित हों, इसके लिए राज्य सरकार एवं सक्षम अधिकारियों को निरीक्षण, नियंत्रण एवं आवश्यक कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है।

    इस अध्याय में पंचायतों के निरीक्षण, अभिलेखों की जांच, आदेशों के निलंबन, पंचायत के विघटन तथा प्रशासक की नियुक्ति से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख किया गया है।


    धारा 103 – निरीक्षण का अधिकार

    प्रमुख प्रावधान

    राज्य सरकार अथवा उसके द्वारा अधिकृत अधिकारी किसी भी ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत या जिला पंचायत के कार्यों का निरीक्षण कर सकते हैं।

    निरीक्षण में शामिल विषय

    • विकास कार्यों की प्रगति
    • पंचायत निधि का उपयोग
    • अभिलेखों की जांच
    • योजनाओं का क्रियान्वयन
    • कर एवं शुल्क की वसूली

    उद्देश्य

    • पारदर्शिता सुनिश्चित करना
    • अनियमितताओं की पहचान करना
    • प्रशासनिक सुधार करना

    धारा 104 – अभिलेख प्रस्तुत करने का दायित्व

    पंचायत के सभी अधिकारी एवं कर्मचारी निरीक्षण अधिकारी को आवश्यक अभिलेख उपलब्ध कराने के लिए बाध्य होंगे।

    प्रमुख अभिलेख

    • बैठक रजिस्टर
    • नकद पुस्तिका
    • बैंक अभिलेख
    • संपत्ति रजिस्टर
    • निर्माण कार्य रजिस्टर
    • योजना संबंधी दस्तावेज

    यदि अभिलेख प्रस्तुत नहीं किए जाते

    तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।


    धारा 105 – आदेशों का निलंबन

    यदि पंचायत द्वारा पारित कोई प्रस्ताव या आदेश—

    • कानून के विरुद्ध हो,
    • सार्वजनिक हित के प्रतिकूल हो,
    • वित्तीय नुकसान पहुँचाने वाला हो,
    • अधिकार क्षेत्र से बाहर हो,

    तो सक्षम प्राधिकारी उसे अस्थायी रूप से निलंबित कर सकता है।

    उद्देश्य

    अवैध या अनुचित निर्णयों को लागू होने से रोकना।


    धारा 106 – निर्देश जारी करने की शक्ति

    राज्य सरकार अथवा सक्षम अधिकारी पंचायत को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर सकते हैं।

    उदाहरण

    • वित्तीय सुधार
    • विकास कार्यों में तेजी
    • अभिलेख संधारण
    • योजनाओं के क्रियान्वयन में सुधार

    पंचायत इन निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य होगी।


    धारा 107 – जांच (Inquiry)

    यदि किसी पंचायत के विरुद्ध शिकायत प्राप्त होती है तो सक्षम अधिकारी जांच के आदेश दे सकता है।

    जांच के आधार

    • भ्रष्टाचार
    • वित्तीय अनियमितता
    • कर्तव्य की उपेक्षा
    • शक्ति का दुरुपयोग
    • सार्वजनिक धन का गलत उपयोग

    जांच प्रक्रिया

    1. शिकायत प्राप्त होना।
    2. प्रारंभिक परीक्षण।
    3. अभिलेखों की जांच।
    4. संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर।
    5. जांच प्रतिवेदन तैयार करना।

    धारा 108 – पंचायत का विघटन (Dissolution)

    यदि पंचायत लगातार अपने वैधानिक दायित्वों का पालन नहीं करती या गंभीर अनियमितताओं में लिप्त पाई जाती है, तो राज्य सरकार उसे विघटित कर सकती है।

    विघटन के संभावित आधार

    • लगातार बैठक न करना
    • विकास कार्यों में गंभीर लापरवाही
    • वित्तीय अनियमितता
    • कानून का बार-बार उल्लंघन
    • प्रशासनिक अक्षमता

    प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत

    पंचायत को विघटित करने से पहले सामान्यतः कारण बताओ सूचना (Show Cause Notice) एवं अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है।


    धारा 109 – प्रशासक की नियुक्ति

    यदि पंचायत विघटित हो जाती है तो नई पंचायत के गठन तक राज्य सरकार एक प्रशासक नियुक्त कर सकती है।

    प्रशासक के कार्य

    • दैनिक प्रशासन चलाना
    • आवश्यक विकास कार्य जारी रखना
    • अभिलेख सुरक्षित रखना
    • नई पंचायत के गठन तक व्यवस्था बनाए रखना

    धारा 110 – पुनर्गठन एवं पुनर्निर्वाचन

    विघटन के बाद कानून के अनुसार निर्धारित अवधि में पंचायत का पुनर्गठन एवं निर्वाचन कराया जाएगा।

    उद्देश्य

    लोकतांत्रिक व्यवस्था को शीघ्र पुनर्स्थापित करना।


    नियंत्रण एवं निरीक्षण के मूल सिद्धांत

    1. पंचायत की स्वायत्तता का सम्मान।
    2. सार्वजनिक धन की सुरक्षा।
    3. प्रशासनिक पारदर्शिता।
    4. प्राकृतिक न्याय का पालन।
    5. लोकतांत्रिक व्यवस्था की निरंतरता।

    इस अध्याय का सार

    धारा             विषय
    103निरीक्षण का अधिकार
    104अभिलेख प्रस्तुत करने का दायित्व
    105आदेशों का निलंबन
    106निर्देश जारी करने की शक्ति
    107जांच
    108पंचायत का विघटन
    109प्रशासक की नियुक्ति
    110पुनर्गठन एवं पुनर्निर्वाचन

    अध्याय – 13 : अपराध, दण्ड एवं विधिक कार्यवाही

    परिचय

    पंचायतों को सार्वजनिक धन, संपत्ति एवं प्रशासनिक अधिकार प्राप्त होते हैं। इन अधिकारों का दुरुपयोग न हो तथा पंचायत व्यवस्था पारदर्शी एवं जवाबदेह बनी रहे, इसके लिए अधिनियम में विभिन्न अपराधों एवं उनके लिए दण्ड का प्रावधान किया गया है।

    इस अध्याय में पंचायत पदाधिकारियों, कर्मचारियों तथा आम नागरिकों द्वारा किए जाने वाले अवैध कार्यों और उनके विरुद्ध की जाने वाली कानूनी कार्रवाई का वर्णन किया गया है।


    धारा 111 – पंचायत संपत्ति को नुकसान पहुँचाना

    प्रमुख प्रावधान

    यदि कोई व्यक्ति पंचायत की संपत्ति को जानबूझकर नुकसान पहुँचाता है, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

    पंचायत संपत्ति के उदाहरण

    • पंचायत भवन
    • सामुदायिक भवन
    • सड़क
    • नाली
    • तालाब
    • स्ट्रीट लाइट
    • सार्वजनिक शौचालय

    उद्देश्य

    सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना।


    धारा 112 – पंचायत कार्य में बाधा डालना

    यदि कोई व्यक्ति पंचायत अधिकारी, कर्मचारी या निर्वाचित प्रतिनिधि को उसके वैधानिक कार्य करने से रोकता है या बाधा उत्पन्न करता है, तो यह दण्डनीय कृत्य माना जाएगा।

    उदाहरण

    • अभिलेख जब्त करने से रोकना
    • निरीक्षण में बाधा डालना
    • सरकारी कार्य में हस्तक्षेप करना

    धारा 113 – गलत जानकारी देना

    कोई भी व्यक्ति यदि पंचायत को जानबूझकर गलत सूचना देता है, झूठा प्रमाण प्रस्तुत करता है या तथ्य छिपाता है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है।

    उद्देश्य

    सरकारी योजनाओं एवं पंचायत निर्णयों में पारदर्शिता बनाए रखना।


    धारा 114 – अभिलेखों में छेड़छाड़

    पंचायत के अभिलेख, रजिस्टर, नकद पुस्तिका, संपत्ति विवरण या अन्य सरकारी दस्तावेजों में जानबूझकर परिवर्तन करना या उन्हें नष्ट करना गंभीर अपराध माना जाएगा।

    संभावित परिणाम

    • विभागीय कार्रवाई
    • आर्थिक वसूली
    • विधिक कार्रवाई

    धारा 115 – पंचायत निधि का दुरुपयोग

    यदि कोई पदाधिकारी, कर्मचारी या अन्य व्यक्ति पंचायत निधि का निजी उपयोग करता है या उसका दुरुपयोग करता है, तो उससे राशि की वसूली की जा सकती है तथा उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

    उदाहरण

    • फर्जी बिल लगाना
    • बिना कार्य भुगतान करना
    • निजी उपयोग के लिए पंचायत धन खर्च करना

    धारा 116 – भ्रष्टाचार एवं कदाचार

    यदि पंचायत का कोई पदाधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर अनुचित लाभ प्राप्त करता है, तो वह अनुशासनात्मक एवं विधिक कार्रवाई का पात्र होगा।

    संभावित कार्रवाई

    • पद से हटाना
    • निलंबन
    • आर्थिक क्षतिपूर्ति
    • न्यायालयीन कार्यवाही

    धारा 117 – दण्ड की वसूली

    अधिनियम के अंतर्गत लगाए गए जुर्माने या क्षतिपूर्ति की राशि नियमानुसार वसूल की जाएगी।

    यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं किया जाता, तो विधि अनुसार वसूली की कार्रवाई की जा सकती है।


    धारा 118 – सद्भावपूर्वक किए गए कार्यों का संरक्षण

    यदि कोई पंचायत पदाधिकारी या कर्मचारी सद्भावना (Good Faith) में अधिनियम के अंतर्गत कार्य करता है, तो उसके विरुद्ध केवल उसी आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जाएगा।

    उद्देश्य

    ईमानदारी से कार्य करने वाले अधिकारियों को अनावश्यक मुकदमों से संरक्षण देना।


    धारा 119 – अभियोजन के लिए अनुमति

    कुछ मामलों में पंचायत पदाधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध न्यायालय में अभियोजन चलाने से पहले सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति आवश्यक हो सकती है।

    महत्व

    • दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से सुरक्षा
    • विधिक प्रक्रिया का पालन

    धारा 120 – अन्य विधिक प्रावधान

    जहाँ इस अधिनियम में विशेष प्रावधान नहीं हैं, वहाँ लागू अन्य कानूनों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

    उदाहरण

    • भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रासंगिक प्रावधान
    • भ्रष्टाचार निरोधक कानून
    • वित्तीय अनियमितता से संबंधित अन्य विधियां

    इस अध्याय का सार

    धारा             विषय
    111पंचायत संपत्ति को नुकसान
    112पंचायत कार्य में बाधा
    113गलत जानकारी देना
    114अभिलेखों में छेड़छाड़
    115पंचायत निधि का दुरुपयोग
    116भ्रष्टाचार एवं कदाचार
    117दण्ड की वसूली
    118सद्भावपूर्वक कार्यों का संरक्षण
    119अभियोजन के लिए अनुमति
    120अन्य विधिक प्रावधान

    अध्याय – 14 : विविध प्रावधान

    परिचय

    किसी भी अधिनियम में कुछ ऐसे प्रावधान होते हैं जो पूरे कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक होते हैं, लेकिन उन्हें किसी एक विशेष विषय में शामिल नहीं किया जा सकता। इन्हें विविध (Miscellaneous) प्रावधान कहा जाता है।

    इस अध्याय में नियम बनाने की शक्ति, कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति, अधिनियम के संरक्षण, अधिकारियों के अधिकार, अभिलेखों की वैधता तथा अन्य पूरक विषयों का उल्लेख किया गया है।


    धारा 121 – नियम बनाने की शक्ति

    प्रमुख प्रावधान

    राज्य सरकार को इस अधिनियम के उद्देश्यों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए नियम (Rules) बनाने का अधिकार प्राप्त है।

    नियमों का उद्देश्य

    • अधिनियम के प्रावधानों को व्यवहार में लागू करना।
    • प्रशासनिक प्रक्रिया स्पष्ट करना।
    • अधिकारियों एवं पंचायतों के कार्य निर्धारित करना।

    उदाहरण

    • चुनाव संबंधी नियम
    • लेखा नियम
    • पंचायत निधि संचालन नियम
    • बैठक संचालन नियम

    धारा 122 – उपनियम (Bye-laws) बनाने की शक्ति

    पंचायत अपने स्थानीय क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुसार उपनियम बना सकती है।

    उपनियम किन विषयों पर हो सकते हैं?

    • बाजार प्रबंधन
    • स्वच्छता व्यवस्था
    • सार्वजनिक स्थानों का उपयोग
    • पशु बाजार
    • जल स्रोतों का संरक्षण
    • स्थानीय मेलों का संचालन

    शर्त

    उपनियम अधिनियम एवं राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के विरुद्ध नहीं होंगे।


    धारा 123 – कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति

    यदि अधिनियम को लागू करने में कोई व्यावहारिक कठिनाई उत्पन्न होती है, तो राज्य सरकार आवश्यक आदेश जारी कर सकती है।

    उद्देश्य

    • प्रशासनिक बाधाओं को दूर करना।
    • पंचायत कार्यों को निरंतर बनाए रखना।
    • विकास कार्यों में विलंब रोकना।

    धारा 124 – लोक सेवक का संरक्षण

    अधिनियम के अंतर्गत सद्भावपूर्वक कार्य करने वाले पंचायत पदाधिकारी एवं अधिकारी को विधिक संरक्षण प्राप्त होगा।

    इसका अर्थ

    यदि किसी अधिकारी ने कानून के अनुसार और ईमानदारी से कार्य किया है, तो उसके विरुद्ध केवल दुर्भावना के आधार पर कार्रवाई नहीं की जाएगी।


    धारा 125 – अभिलेखों की प्रमाणिकता

    पंचायत द्वारा विधिवत तैयार किए गए अभिलेख, रजिस्टर एवं प्रमाण पत्र आधिकारिक दस्तावेज माने जाएंगे।

    उदाहरण

    • जन्म प्रमाण पत्र
    • मृत्यु प्रमाण पत्र
    • पंचायत बैठक कार्यवाही
    • कर वसूली रजिस्टर
    • पंचायत संपत्ति रजिस्टर

    धारा 126 – सूचना एवं प्रतिवेदन

    राज्य सरकार अथवा सक्षम अधिकारी द्वारा मांगी गई जानकारी पंचायत को निर्धारित समय के भीतर उपलब्ध करानी होगी।

    इसमें शामिल हो सकते हैं

    • वित्तीय विवरण
    • विकास कार्यों की प्रगति
    • योजनाओं का क्रियान्वयन
    • पंचायत की वार्षिक रिपोर्ट

    धारा 127 – आदेशों का पालन

    राज्य सरकार अथवा सक्षम प्राधिकारी द्वारा अधिनियम के अंतर्गत जारी किए गए वैध आदेशों का पालन पंचायत के लिए अनिवार्य होगा।

    उद्देश्य

    • पूरे राज्य में प्रशासनिक एकरूपता बनाए रखना।
    • कानून का प्रभावी पालन सुनिश्चित करना।

    धारा 128 – विवादों का निस्तारण

    अधिनियम के अंतर्गत उत्पन्न प्रशासनिक विवादों का निस्तारण नियमानुसार सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जाएगा।

    संभावित विवाद

    • पंचायत सीमा विवाद
    • संपत्ति विवाद
    • अधिकार क्षेत्र विवाद
    • प्रशासनिक निर्णयों पर आपत्ति

    धारा 129 – पूर्व कार्यों का संरक्षण

    यदि अधिनियम लागू होने से पहले किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा वैध रूप से कोई कार्य किया गया था, तो वह केवल अधिनियम लागू होने के कारण अवैध नहीं माना जाएगा।

    उद्देश्य

    प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखना।


    धारा 130 – निरसन एवं बचाव (Repeal and Saving)

    यदि इस अधिनियम के लागू होने से पहले कोई पुराना पंचायत कानून प्रभावी था, तो उसके स्थान पर यह अधिनियम लागू होगा।

    बचाव प्रावधान

    पुराने अधिनियम के अंतर्गत किए गए वैध कार्य, आदेश, नियुक्तियाँ एवं निर्णय तब तक प्रभावी रहेंगे जब तक वे इस अधिनियम के विपरीत न हों।


    इस अध्याय का सार

    धारा              विषय
    121नियम बनाने की शक्ति
    122उपनियम बनाने की शक्ति
    123कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति
    124लोक सेवकों का संरक्षण
    125अभिलेखों की प्रमाणिकता
    126सूचना एवं प्रतिवेदन
    127आदेशों का पालन
    128विवादों का निस्तारण
    129पूर्व कार्यों का संरक्षण
    130निरसन एवं बचाव

    अध्याय – 15 : अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों का विस्तार (PESA), 1996 एवं ग्राम सभा के विशेष अधिकार

    परिचय

    भारत के संविधान में अनुसूचित जनजातियों की परंपराओं, संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था तथा प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। संविधान के 73वें संशोधन द्वारा पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद यह आवश्यकता महसूस की गई कि अनुसूचित क्षेत्रों में सामान्य पंचायत व्यवस्था के बजाय आदिवासी परंपराओं के अनुरूप स्थानीय स्वशासन स्थापित किया जाए।

    इसी उद्देश्य से संसद ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (Panchayats Extension to Scheduled Areas Act, 1996 - PESA) बनाया।

    छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जिलों एवं विकासखंडों में पंचायतों का संचालन PESA के विशेष प्रावधानों के अनुसार किया जाता है।


    धारा 131 – अनुसूचित क्षेत्र की ग्राम सभा

    प्रमुख प्रावधान

    अनुसूचित क्षेत्र में ग्राम सभा स्थानीय स्वशासन की सबसे महत्वपूर्ण संस्था होगी।

    ग्राम सभा की संरचना

    • ग्राम के सभी वयस्क मतदाता इसके सदस्य होंगे।
    • ग्राम सभा अपने निर्णय स्वयं लेगी।
    • ग्राम सभा की परंपराओं एवं रीति-रिवाजों का सम्मान किया जाएगा।

    उद्देश्य

    निर्णय लेने की शक्ति सीधे ग्रामवासियों को देना।


    धारा 132 – परंपराओं एवं संस्कृति का संरक्षण

    ग्राम सभा का दायित्व होगा कि वह—

    • आदिवासी परंपराओं की रक्षा करे।
    • सांस्कृतिक पहचान बनाए रखे।
    • सामाजिक एवं धार्मिक परंपराओं का संरक्षण करे।
    • सामुदायिक संसाधनों की रक्षा करे।

    धारा 133 – जल, जंगल एवं जमीन पर ग्राम सभा की भूमिका

    अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    ग्राम सभा के अधिकार

    • जल स्रोतों का संरक्षण
    • ग्राम वन की सुरक्षा
    • सामुदायिक भूमि का प्रबंधन
    • प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर सुझाव देना
    • पर्यावरण संरक्षण में भागीदारी

    धारा 134 – लघु वनोपज (Minor Forest Produce)

    प्रमुख प्रावधान

    ग्राम सभा को अपने क्षेत्र की लघु वनोपज के संग्रहण, उपयोग एवं प्रबंधन में महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं।

    लघु वनोपज के उदाहरण

    • तेंदूपत्ता
    • महुआ
    • साल बीज
    • चिरौंजी
    • हर्रा
    • बहेरा
    • इमली
    • लाख

    महत्व

    इससे आदिवासी समुदाय की आजीविका मजबूत होती है।


    धारा 135 – भूमि अधिग्रहण में ग्राम सभा की भूमिका

    यदि किसी अनुसूचित क्षेत्र में विकास परियोजना, उद्योग या अन्य सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भूमि अधिग्रहण प्रस्तावित हो, तो ग्राम सभा से परामर्श करना आवश्यक होगा।

    उद्देश्य

    • स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
    • अनावश्यक विस्थापन रोकना।
    • पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया अपनाना।

    धारा 136 – पुनर्वास एवं विस्थापन

    यदि किसी परियोजना के कारण लोगों का विस्थापन होता है तो ग्राम सभा पुनर्वास योजना पर अपने सुझाव दे सकती है।

    प्रमुख उद्देश्य

    • प्रभावित परिवारों के हितों की रक्षा।
    • उचित पुनर्वास एवं आजीविका सुनिश्चित करना।
    • सामाजिक न्याय स्थापित करना।

    धारा 137 – ग्राम स्तरीय योजनाओं का अनुमोदन

    अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम स्तर की विकास योजनाओं को ग्राम सभा के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

    ग्राम सभा की भूमिका

    • योजना पर चर्चा करना।
    • प्राथमिकताएँ तय करना।
    • सुझाव देना।
    • स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार संशोधन करना।

    धारा 138 – लाभार्थियों का चयन

    सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के चयन में ग्राम सभा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    उदाहरण

    • प्रधानमंत्री आवास योजना
    • सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ
    • आजीविका योजनाएँ
    • छात्रवृत्ति योजनाएँ

    उद्देश्य

    पारदर्शिता एवं निष्पक्षता सुनिश्चित करना।


    धारा 139 – ग्राम बाजार एवं स्थानीय संसाधनों का प्रबंधन

    ग्राम सभा स्थानीय हाट, बाजार एवं सामुदायिक संसाधनों के प्रबंधन में भागीदारी कर सकती है।

    लाभ

    • स्थानीय व्यापार को बढ़ावा
    • ग्राम स्तर पर आय में वृद्धि
    • सामुदायिक नियंत्रण मजबूत होना

    धारा 140 – सामाजिक न्याय एवं विवाद समाधान

    ग्राम सभा स्थानीय स्तर पर सामाजिक सद्भाव बनाए रखने तथा छोटे-मोटे सामुदायिक विवादों के समाधान में सहयोग कर सकती है।

    प्रमुख उद्देश्य

    • परंपरागत व्यवस्था का सम्मान
    • सामुदायिक भागीदारी
    • त्वरित स्थानीय समाधान

    PESA के मूल सिद्धांत

    1. ग्राम सभा सर्वोच्च स्थानीय संस्था है।
    2. आदिवासी परंपराओं का संरक्षण किया जाएगा।
    3. जल, जंगल एवं जमीन के संरक्षण में ग्राम सभा की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
    4. विकास योजनाओं में स्थानीय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
    5. प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग में समुदाय की राय को महत्व दिया जाएगा।

    इस अध्याय का सार

    धारा       विषय
    131अनुसूचित क्षेत्र की ग्राम सभा
    132संस्कृति एवं परंपराओं का संरक्षण
    133जल, जंगल एवं जमीन
    134लघु वनोपज
    135भूमि अधिग्रहण
    136पुनर्वास
    137विकास योजनाओं का अनुमोदन
    138लाभार्थियों का चयन
    139ग्राम बाजार प्रबंधन
    140सामाजिक न्याय एवं विवाद समाधान

    अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

    प्रश्न 1. ग्राम सभा की बैठक न्यूनतम कितने समय में एक बार आयोजित की जाती है?
    उत्तर: प्रत्येक तीन माह में कम से कम एक बार।

    प्रश्न 2. ग्राम सभा की बैठक के लिए न्यूनतम गणपूर्ति कितनी है?
    उत्तर: कुल सदस्यों का एक-दसवाँ तथा उनमें कम से कम एक-तिहाई महिलाएँ।

    प्रश्न 3. ग्राम विकास योजनाओं का अनुमोदन कौन करता है?
    उत्तर: ग्राम सभा।

    प्रश्न4. पंचायत का मुख्य उद्देश्य क्या है?
    उत्तर: स्थानीय स्वशासन स्थापित करना एवं ग्रामीण विकास को बढ़ावा देना।

    प्रश्न5. पंचायत सार्वजनिक संपत्तियों के संरक्षण के लिए उत्तरदायी है या नहीं?
    उत्तर: हाँ, यह उसका वैधानिक दायित्व है।

    प्रश्न6. पंचायत किन क्षेत्रों में कार्य करती है?
    उत्तर: प्रशासन, विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सामाजिक न्याय, प्राकृतिक संसाधन संरक्षण तथा सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में।

    प्रश्न7. पंचायत निधि का उपयोग किन कार्यों के लिए किया जाता है?
    उत्तर: केवल सार्वजनिक एवं विकास कार्यों के लिए।

    प्रश्न8. पंचायत का वार्षिक बजट कब तैयार किया जाता है?
    उत्तर: प्रत्येक वित्तीय वर्ष प्रारंभ होने से पूर्व।

    प्रश्न9. पंचायत के खातों का लेखा परीक्षण क्यों किया जाता है?
    उत्तर: वित्तीय पारदर्शिता एवं सार्वजनिक धन के सही उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए।

    अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर 

    1. छत्तीसगढ़ में पंचायती राज व्यवस्था त्रिस्तरीय है।
    2. सरपंच का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा किया जाता है।
    3. उपसरपंच का चुनाव निर्वाचित पंचों द्वारा किया जाता है।
    4. जनपद एवं जिला पंचायत के अध्यक्ष अपने-अपने निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
    5. पंचायत क्षेत्रों का विभाजन जनसंख्या के आधार पर किया जाता है।
    6. सरपंच ग्राम पंचायत का कार्यकारी प्रमुख होता है।
    7. उपसरपंच सरपंच की अनुपस्थिति में उसके अधिकारों का प्रयोग करता है।
    8. जनपद एवं जिला पंचायत के अध्यक्ष अपने निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
    9. अविश्वास प्रस्ताव लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने का माध्यम है।
    10. पंचायत पदाधिकारी सार्वजनिक धन एवं अभिलेखों के लिए उत्तरदायी होते हैं।
    11. पंचायत के सभी महत्वपूर्ण निर्णय बैठक में लिए जाते हैं।
    12. प्रत्येक बैठक की लिखित कार्यवाही तैयार करना अनिवार्य है।
    13. कार्यवाही रजिस्टर पंचायत का आधिकारिक दस्तावेज होता है।
    14. पंचायत विभिन्न विषयों के लिए स्थायी समितियों का गठन कर सकती है।
    15. पंचायत अभिलेखों का निरीक्षण सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जा सकता है।
    16. पंचायतों को स्थानीय कर लगाने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है।
    17. कर से प्राप्त राशि पंचायत निधि का हिस्सा होती है।
    18. प्रत्येक कर की वसूली अधिकृत रसीद के माध्यम से की जानी चाहिए।
    19. कर निर्धारण में पारदर्शिता एवं समानता का सिद्धांत लागू होता है।
    20. गलत कर निर्धारण के विरुद्ध अपील का अधिकार उपलब्ध है।
    21. प्रत्येक पंचायत को वार्षिक बजट तैयार करना अनिवार्य है।
    22. प्रत्येक वित्तीय लेन-देन का अभिलेख रखा जाता है।
    23. ऑडिट का उद्देश्य सार्वजनिक धन की सुरक्षा एवं पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।
    24. ऑडिट आपत्तियों का समयबद्ध निराकरण आवश्यक है।
    25. वित्तीय अनियमितता की स्थिति में वसूली एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
    26. पंचायत सचिव ग्राम पंचायत का प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी होता है।
    27. मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद एवं जिला पंचायत के प्रशासन का संचालन करता है।
    28. पंचायत अधिकारी लोक सेवक माने जाते हैं।
    29. पंचायत अभिलेखों का संरक्षण एक वैधानिक दायित्व है।
    30. सरकारी धन के दुरुपयोग पर विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
    31. पंचायत चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग कराता है।
    32. मतदाता सूची चुनाव का आधार होती है।
    33. गुप्त मतदान पंचायत चुनाव का मूल सिद्धांत है।
    34. निर्वाचन विवाद केवल निर्धारित विधिक प्रक्रिया के माध्यम से चुनौती दिए जा सकते हैं।
    35. रिक्त पदों के लिए उपचुनाव कराए जा सकते हैं।
    36. पंचायतों का निरीक्षण राज्य सरकार या अधिकृत अधिकारी कर सकते हैं।
    37. अवैध प्रस्तावों को निलंबित किया जा सकता है।
    38. गंभीर अनियमितता की स्थिति में जांच कराई जा सकती है।
    39. पंचायत के विघटन से पहले सामान्यतः सुनवाई का अवसर दिया जाता है।
    40. विघटन के बाद प्रशासक नियुक्त किया जा सकता है तथा बाद में पुनः निर्वाचन कराया जाता है।
    41. पंचायत निधि का दुरुपयोग गंभीर वित्तीय अनियमितता माना जाता है।
    42. पंचायत अभिलेखों में छेड़छाड़ दण्डनीय अपराध है।
    43. सद्भावपूर्वक किए गए कार्यों को विधिक संरक्षण प्राप्त होता है।
    44. सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने पर क्षतिपूर्ति एवं दण्ड दोनों हो सकते हैं।
    45. पंचायत प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही इस अध्याय का मूल उद्देश्य है।
    46. राज्य सरकार को अधिनियम के अंतर्गत नियम बनाने का अधिकार है।
    47. पंचायत स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार उपनियम बना सकती है।
    48. पंचायत अभिलेख आधिकारिक दस्तावेज माने जाते हैं।
    49. सद्भावपूर्वक किए गए कार्यों को विधिक संरक्षण प्राप्त है।
    50. पुराने अधिनियम के अंतर्गत किए गए वैध कार्य सामान्यतः सुरक्षित रहते हैं।
    51. PESA अधिनियम 1996 अनुसूचित क्षेत्रों के लिए बनाया गया है।
    52. अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को विशेष अधिकार प्राप्त हैं।
    53. लघु वनोपज के प्रबंधन में ग्राम सभा की महत्वपूर्ण भूमिका है।
    54. विकास योजनाओं एवं लाभार्थी चयन में ग्राम सभा की भागीदारी सुनिश्चित की गई है।
    55. आदिवासी परंपराओं एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है।



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